चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२४ चरकसंहिता [अ० १५ उपरोक्त चूर्ण को मिला कर लोहे के पात्र मे पकाना चाहिये । जब यह घट्ट (कठिन) बन जाये तो इसमे से चार मासा मात्रा गरम पानी के साथ खानी चाहिये । अथवा मद्य के साथ इसको खाना चाहिये । इससे ग्रहणीरोग, शोथ, अर्श और पाण्डुरोग नष्ट होता है ॥ १८७-१८८ ॥ त्रिफला कटभी चव्यं बिल्वनध्यमयो रजः । रोहिणी कटुका मुस्तं कुष्ठं पाठा च हिङ्गु च ॥ १८६ ॥ मधुकं मुष्ककयवक्षारौ त्रिकटुक वचाम् । विडङ्गं पिप्पलीमूलं स्वर्जिका निम्बचित्रकौ ॥ १६० ॥ मूर्वाजमोदेन्द्रयवान् गुडूचीं देवदारु च । कार्षिकं लवणानां च पञ्चानां पलिकान्पृथक् ॥ १६१ ॥ भागान्दध्नि त्रिकुडवे घृततैलेन मूर्च्छितान् । अन्तर्धूमं शनैर्दग्ध्वा तस्मात्पाणितलं पिबेत् ॥ १६२ ॥ सपिषा कफवाताशार्ग्रहणीपाण्डुरोगवान् । प्लीहमूत्रग्रहश्वासहिक्काकासक्रिमिज्वरान् ॥ १६३ ॥ शोषातिसारौ श्वयथुं प्रमेहानाहहृद्ग्रहान् । हन्यात्सर्वविषं चैव क्षारोऽग्निजननो वरः ॥ १६४ ॥ जीर्णे रसैर्वा मधुरैरश्रीयात्पयसाऽपि वा । (४६) हरड़, बहेडा, आंवला, कटभी (वापुवा या अपामार्ग), चविका, बेलगिरी, लोहभस्म, रोहिणी (रोहेडा), कुटकी, नागरमोथा, कूठ, पाठा, हींग, मुलहठी, मुष्कक (गुजराती मे मोखो), यवक्षार, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पिप्पली), वच, बायबिडंग, पिप्पलीमूल, सर्जक्षार, नीम की छाल, चीता, मूर्वा, अजमोदा, इन्द्रयव, गिलोय और देवदारु प्रत्येक वस्तु एक एक कर्ष ओर पाचो नमक (सौवर्चल, सामुद्र, सैन्धव, बिड् ओर उद्भिद) पृथक् २ एक एक पल लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । दधि ३ कुड़व, घृत और तैल मिश्रित ३ कुड़व लेकर अन्तर्धूम से धीरे धीरे पकाना चाहिये । जब यह चूर्ण जल जाये इसमें से पाणितल अर्थात् कर्ष परिमित मात्रा को घी के साथ पीना चाहिये । इससे कफजन्य अर्श, वातजन्य अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डुरोग, प्लीहा, मूत्रग्रह, श्वास, कास, हिचकी, कृमि रोग, ज्वर, शोष, अतिसार, शोथ, प्रमेह, आनाह, हृदयग्रह नष्ट होता है । यह क्षार सब विषों को नष्ट करता है, अग्नि को बढ़ाता है । इसके जीर्ण होने पर मधुर मास-रस के साथ अथवा दूध के साथ अन्न को खाना चाहिये ॥ १८६-१६४ ॥