चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 607, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६२३ पटोल, नीम की छाल, पित्तपापड़ा इनको समान भाग लेकर सब के बराबर भैंस का मूत्र लेकर जलाना चाहिये यह क्षार अग्निवर्धक है ॥ १८२ ॥ द्वे हरिद्रे वचा कुष्ठं चित्रकः कटुरोहिणी । मुस्तं च बस्तमूत्रेण सिद्धः क्षारोऽग्निवर्धनः ॥ १८३ ॥ इति तृतीयः क्षारः । (४६) क्षार (३)—दोनो हल्दिया (हरिद्रा और दारुहल्दी), वच, कूठ, चीता, कुटकी और नागरमोथा इनको समान भाग लेकर सबके बराबर बकरे का मूत्र लेकर जलाना चाहिये। यह क्षार अग्निवर्धक है ॥ १८३ ॥ चतुष्पलं सुधाकाण्डात्रिपलं लवणत्रयात् । वार्त्ताकीकुडवं चार्कादष्टौ द्वे चित्रकात्पले ॥ १८४ ॥ दग्धानि वार्त्ताकुरसे गुलिका भोजनोत्तराः । भुक्तं भुक्तं पचन्त्याशु कासश्वासार्शसां हिताः ॥ १८५ ॥ विसूचिकाप्रतिश्यायहृद्रोगशमनाश्च ताः । इत्येषा क्षारगुडिका कृष्णात्रेयेण कीर्तिता १ ॥ १८६ ॥ इति क्षारगुडिकाः । (४७) सेहुण्ड का डण्डा ४ पल, तीनो नमक (सौवर्चल, विड् और सैन्धव) मिलित तीन पल, वार्त्ताकी (बेगन) एक कुडव, आक ८ पल, चीता दो पल इनको जला कर क्षार बना लेना चाहिये। इस क्षार की बेगन के रस मे गोलिया बाधनी चाहिये। इन गोलियों को भोजन के पीछे खाना चाहिये। इनके सेवन से खाया हुआ भोजन शीघ्र पच जाता है, ये कास, श्वास और अर्श-रोग मे हितकारी हैं। इनसे विसूचिका, प्रतिश्याय और हृदयरोग नष्ट होते हैं। इस क्षार-गुटिका का उपदेश कृष्णात्रेय ने किया है ॥ १८४-१८६ ॥ वत्सकातिविषे पाठा दुःस्पर्शा हिङ्गु चित्रकम् । चूर्णीकृत्य पलाशाना क्षारे मूत्रस्रुते पचेत् ॥ १८७ ॥ आयसे भाजने सान्द्रात्तस्मात्कोलं सुखाम्बुना । मद्यैर्वा ग्रहणीदोषे शोथार्शः पाण्डुमान् पिवेत् ॥ १८८ ॥ (४८) वत्सक (इन्द्रजौ), अतीस, पाठा की छाल, दुःस्पर्शा (कौच), हींग और चीता इन सब को समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये। पलाश (ढाक) को जला कर उसकी भस्म को गोमूत्र मे घोल लेना चाहिये। फिर इसको छान या नितार लेना चाहिये। अब इस मूत्रयुक्त क्षार में १ इतिश्लोकार्धः कतिपयपुस्तकेषु न दृश्यते ।