भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 606

६२२ चरकसंहिता [ अ० १५ पाचों नमक एक पल, दही दो प्रस्थ, तैल और घृत मिलित दो कुड़व लेकर एक पात्र में रख देना चाहिये । ऊपर से इनको ढाप देना चाहिये । फिर इसके नीचे धीमी धीमी अग्नि जलानी चाहिये । जब दवाइयों का रस सब निकल जाये और चूर्ण जलने न पाये केवल घृत शेष रह जाये तो उतार लेना चाहिये । इस चूर्ण को घृत में मिला कर एक कर्ष मात्रा मे पीना चाहिये । इसके जीर्ण होने पर मधुर पदार्थ खाना चाहिये । यह औषध वात, कफजन्य रोगो को, विष को तथा गर ( सयोग जन्य ) विष को नष्ट करता है ॥ १७४-१७७ ॥ भल्लातकं त्रिकटुकं त्रिफलां लवणत्रिकम् । अन्तर्धूमं द्विपलिकं गोपुरीषाग्निना दहेत् ॥ १७८ ॥ स क्षारः सर्पिषा पीतो भोज्ये चाप्यवचारितः१ । हृत्पाण्डुग्रहणीदोषगुल्मोदावर्त्तशूलनुत् ॥ १७६ ॥ ( ४३ ) भिलावा, सोठ, मरिच, पिप्पली, हरड़, बहेड़ा, आवला, तीन लवण ( सौवर्चल, सैन्धव और बिड नमक ) प्रत्येक वस्तु दो दो पल लेकर अन्तर्धूम 'अग्नि से पकाना चाहिये । इसमे अरण्ये उपलो की आच देनी चाहिये । इस क्षार को घी मे मिला कर पीना चाहिये अथवा भोजन मे, दाल, शाक मे डाल कर खाना चाहिये । हृदयरोग, पाण्डुरोग, ग्रहणीरोग, गुल्म, उदावर्त्त और शूल को यह क्षार नष्ट करता है ॥ १७६ ॥ दुरालभा करञ्जौ द्वौ सप्तपर्ण सवत्सकम् । षड्ग्रन्थां सदनं मूर्वा पाठामागर्वधं तथा ॥ १८० ॥ गोमूत्रेण समांशानि कृत्वा चूर्णानि दाहयेत् । दग्ध्वा च तं पिबेत्क्षारं ग्रहणीबलवर्धनम् ॥ १८१ ॥ इति प्रथमः क्षारः । ( ४४ ) क्षार (१)-दुरालभा, करज और पूति करज, सतवन, कुटज की छाल (या इन्द्रजौ ), षड्ग्रन्था (वच), मैनफल, मूर्वा, पाठा, अमलतास इनको परस्पर समान भाग लेकर सबके बराबर गोमूत्र मिला कर इनको जलाना चाहिये जलाकर इस क्षार का पीना चाहिये, इससे ग्रहणी (अग्नि) का बल बढ़ता है ॥१८१॥ भूनिम्बं रोहिणीं तिक्तां पटोलं निम्बपर्पटम् । दहेन्माहिषमूत्रेण क्षार एषोऽग्निवर्धनः ॥ १८२ ॥ इति द्वितीयः क्षारः । (४५) क्षार (२) - भूनिम्ब (चिरायता), रोहिणी (रोहेड़ा), तिक्ता (कुटकी), १. “चाप्यवचूर्णितः” इति च पाठः ।