चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 82, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंशूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजक- मासुरं विद्यात् ॥ ४६ ॥ (१) आसुर—जो शूरवीर, प्रचण्ड, दूसरे की निन्दा करने वाला, ऐश्वर्यशाली, छल कपट करने वाला, रुद्र के तुल्य कोप से शत्रुओं को रुलाने वाला, भयकर, दूसरों पर दया न करने वाला, अपनी ही बड़ाई चाहने वाला, आत्माभिमानी हो उसको 'आसुर' जाने ॥ ४६ ॥ अमर्षणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमा मिषप्रियतमं स्वप्नायासबहुलमर्षुं राक्षसं विद्यात् ॥ ४७ ॥ (२) राक्षस—जो असहनशील, कारण से कुपित होने वाला, छिद्र अर्थात् शत्रु के कमजोर स्थान पर चोट करने वाला, क्रूर, भोजन में अधिक रुचि रखने वाला, मांस का बहुत प्यारा, खूब सोने और खूब परिश्रम करने वाला, ईर्ष्या- शील हो उसको 'राक्षस' चित्त वाला जाने ॥ ४७ ॥ महालसं(शनं) स्त्रैण स्त्रीरहस्काममशुचि शुचिद्वेषिणं भीरु भीषयि- तारं विकृत-विहाराहार-शीलं पैशाचं विद्यात् ॥ ४८ ॥ (३) पैशाच—जो बहुत खाने वाला, स्त्री के समान स्वभाव का, स्त्रियों के साथ एकान्त मे रहने की इच्छावाला, अपवित्र, शुद्धता वा स्वच्छता से द्वेष करनेवाला, भीरु, दूसरों को डरानेवाला, विकृत आहार और विकृत विहार वाला हो उसको 'पैशाच' स्वभाव का जाने ॥ ४८ ॥ क्रुद्धं शूरमक्रुद्धं भीरु तीक्ष्णमायासबहुलं संत्रस्तगोचरमाहारविहा- रपरं सार्पं विद्यात् ॥ ४९ ॥ (४) सार्प—जो क्रोधित होने पर शूर और अक्रोधित होने पर भीरु, तीखे स्वभाव का, परिश्रम करनेवाला, भययुक्त स्थानों मे भी दीखनेवाला और आहार विहार करने वाला हो उस पुरुष को 'सार्प' स्वभाव का जाने ॥ ४९ ॥ आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकमसंविभागिनमतिलो लुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् ॥ ५० ॥ (५) प्रैत—जो सदा भोजन की इच्छा करने वाला, बहुत दुःखकारी शील और आचार और उपचार से युक्त, निन्दा करने वाला, दूसरों को अपने धन में से भाग न देने वाला, बहुत लोभी, कर्म न करने वाला पुरुष हो उसको 'प्रैत' अर्थात् प्रेत स्वभाव का जाने ॥ ५० ॥ अनुषक्तकाममजस्रमाहार-विहार-परमनवस्थितममर्षिणमसंचयं- शाकुणं विद्यात् ॥ ५१ ॥