भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूवाणी-श्री दादूलीला विहंगावलोकन

और बोले - “जो हमारी वाणी का आश्रय लेकर निर्गुण भक्ति करेंगे, उनकी परब्रह्म रक्षा करेंगे और जो इष्ट - भ्रष्ट होगा, उसे परम - पद नहीं मिलेगा ।” इसी कारण श्री महाराजजी के महाप्रयाण के बाद उनकी वाणी ही सबसे अधिक पूज्यनीय सिद्ध हुई । आज भी दादू - सम्प्रदाय के सभी पूजन स्थलोंमें श्रीवाणीजी का प्रमुख पूजन होता है । कहीं कहीं भक्तजनों ने अपनी भावनानुसार चित्र भी प्रतिष्ठित किए हैं । निजस्वरूप में प्रवेश शनैः शनैः तपोमूर्ति श्री दादूदयालजी महाराज के लीला संवरण का समय आ पहुँचा । परमज्योति से ज्योति का मिलन तो अवश्यंभावी है । उस समय श्री महाराजजी नारायणा में विराजमान थे । संत माधोदासजी के अनुसार - बासुर होय समीप रहे दिन, आवत पालकी पंथ आकाशा । के शर चन्दन छाय सुगन्धित, ल्याय धरे सुर मंदिर पासा ।। ज्येष्ठ कृष्ण सप्तमी वि. सं. 1660, उस दिन चार दिव्य पार्षद पुरुष पालकी लिए हुए आकाश मार्ग से धरा पर उतरे । सभी शिष्यों ने, राजा नारायणदासजी ने तथा उनकी प्रजा ने इस अदभुत दृश्य को देखा । सबने महाराजजी से पालकी के आने का कारण पूछा तब उन्हों ने कहा “कल करिहैं निज लोक प्रवेशा ” दूसरे दिन परम पावन पुण्य तिथि अष्टमी को तीन बार आकाशवाणी द्वारा महाराज श्री को पालकी में बिराजमान होने का निर्देश मिला । श्री महाराजजी शांतभाव से पालकी में बिराजमान हुए । दिव्य पालकी के आने एवं महाराज श्री के निजस्वरूप में प्रवेश का समाचार तो पहले दिन ही पूरे क्षेत्र में फैल चुका था । हजारों, हजारों की संख्या में दूर - दूर से आए भक्त गण नारायणा में श्री महाराजजी के दर्शनार्थ एकत्र होगए । एकत्र विशाल जनसमुदाय के सामने ही श्री महाराजजी ने शांत भाव से पालकी में प्रवेश किया । तब दिव्य पार्षद - पुरुषों द्वारा संचालित वह पालकी ऊपर

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