भारतकोश
सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

सन्त दादू दयाल वाणी (सन्त दादू दयाल जी - सम्पूर्ण साखी एवं पद सटीक)

Sant Dadu Dayal Vani with Hindi Commentary

सन्त दादू दयाल जी द्वारा

DevanagariHindipublished504 पृष्ठ

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श्री दादूलीला विहंगावलोकन भगवदाज्ञा - सागर के मध्य में एक टापू पर तीन दिव्य सिद्ध महापुरुष तपस्या कर रहे थे । भारतीय संस्कृति में तप की बहुत बड़ी महिमा बताई गई है । दिव्य शक्ति तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए तप सदैव एक प्रमुख साधन रहा है । सुर - नर - मुनि के तप की बात तो सर्वविदित ही है, महाप्रतापी तथा शक्तिशाली दैत्य - दानव - राक्षस भी तप के द्वारा दुर्लभ वरदान पाकर त्रिलोक विजयी हुए हैं । यहां तक कि ब्रह्मा - विष्णु - महेश को भी सृजन - पालन और संहार की शक्ति तप के द्वारा ही प्राप्त हुई है । यथा - तप बल रचई प्रपंचु विधाता । तप बल विष्णु सकल जग त्राता ।। तप बल संभु करहिं संहारा । तप बल सेषु धरहिं महि भारा ।। (रा. च. मा.) अब अपने विषय पर आइये । सागर के एक टापू पर तीन सिद्ध तप कर रहे थे कि आकाशवाणी हुई - "आप में से एक संसारी जीवों का उद्धार करने के लिए संसार में जाए ।" इस वाणी को परमात्मा की आज्ञा मानकर तीनों ने विचार किया, फिर एक सिद्ध पुरुष सागर से भवसागर में जाने के उद्देश्य से अदृश्य हो गए । इस प्रसंग में श्री दादूदयालजी महाराज के परम शिष्य श्री राघवदासजी ने (भक्तमाल में) इस प्रकार लिखा है - सागर में टापू ता में तीन सिद्ध ध्यान करें । एक को जु आज्ञा भई जीव निस्तारिए ।। निजानंद निज ब्रह्म अपारा । तिनकी आज्ञा सौं तन धारा ।। सब जीवन की पूरी आसा । भक्ति हेतु हरि कियो बिलासा ।। इस आध्यात्मिक स्थिति तक अभी वर्तमान विज्ञान नहीं पहुंचा है । जिस दिन ईश्वर की दिव्य लीलाओं का विज्ञान स्वीकार कर लेगा, उसी दिन से वह विशुद्ध विज्ञान के पथ का पथिक हो जाएगा । -6-