दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)
महाकवि दण्डी द्वारा
स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri. Funding: MIDF ४२४ दशकुमारचरितम् । [ उत्तरपीठिकायां दुरारद्ध्यं भवेत् । शास्त्रसमज्ञातो हि यहदाति, यन्मानयति, यत्प्रियं ब्रवीति, तत्सर्वमभिसंधातुमित्यविश्वासः। अविश्वास्यता हि जन्मभूमि- रलक्ष्म्याः। यावता च नयेन विना न लोकयात्रा स लोकात् एव सिद्धः नात्र शास्त्रेणार्थः। स्तनंधयोऽपि हि तैस्तैरुपायैः स्तनपानं जनन्या लिप्स- ते, तदपास्यातियन्त्रणामनुभूयन्तां यथेष्टमिन्द्रियसुखानि । (१३) येऽप्युपदिशन्ति 'एवमिन्द्रियाणि जेतव्यानि, एवमरिषड्व- र्गस्त्याज्यः, सामादिरुपायवर्गः स्वेषु परेषु चाजस्रं प्रयोज्यः, संधिविग्रह- चिन्तयैव नेयः कालः, स्वल्पोऽपि सुखस्यावकाशो न देयः' इति, तैर- प्येभिर्मन्त्रिबकैर्युष्मत्तश्चौर्यार्जितं धनं दासीगृहेष्वेव भुज्यते । के चैते इत्यत्र पञ्चमी विभक्तिः। लिप्सते लब्धुमिच्छति। अपास्य दूरीकृत्य । अतियन्त्रणाम् अत्यर्थनिपीडनं नीतिशास्त्रस्येति शेषः । (१३) अरिषड्वर्गः कामक्रोधादयः । इत्यन्तम् उपदिशन्तीत्यस्य कर्म । मन्त्रिबकैः निकृष्टमन्त्रिभिः । दासीगृहेषु परस्त्रीष्वित्यर्थः । एते उपदेशकाः। के उपदेष्टुं नाधिकारिणः । मन्त्रकर्कशाः नीतिकठोराः । तन्त्रकर्त्तारः नीतिशास्त्रप्रणे- तो राज्यका कुछ लाभ अवश्य करा देते हैं-राजाका सन्मान करते हैं तथा चिकनी-चुपड़ी बातें बनाते हैं परन्तु, ये सब कार्य उन भोले-भाले राजाओंको ठगने का पाखण्डमात्र रहता है अतएव उनपर विश्वास नहीं होता है । जहाँ विश्वास नहीं रहता है वहाँ दारिद्र्यका आगमन अनिवार्य हो जाता है। लोक-व्यवहार में रहते-रहते मनुष्यको जीवननिर्वाहके लिये उनकी नीति आप ही आप आ जाती है। जितनेसे उनका काम होता है उतनी नीति जाननेके लिए शास्त्राध्ययनकी आवश्यकता नहीं पड़ती। दूध पीनेवाला बालक किसी न किसी उपायके सहारे अपनी माँका स्तनपान कर ही लेता है, यद्यपि उसे सभी तरह क्लेश उठाने पड़ते हैं तथापि वह समस्तेन्द्रिय-जनित सुखों वा दुःखोंका अनुभव कर ही लेता है-इसमें तो कोई संशय ही नहीं है। (१३) जो उपदेशक मन्त्री आदि राजाओंको उपदेश देते हुए कहते हैं कि इस प्रकार से इस रीतिसे इन्द्रियां वशमें रहतो हैं। काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि छहों शत्रुओं से दूर रहो। अपने-परायेके भेद-भावोंको त्याग दो। साम-दानादि उपायोंसे कार्य करो। सर्वदा सन्धि-विग्रह आदि तथा राज्यश्रीकी उन्नतिको सोचते हुए समय विताओ । क्षणमात्र भी समय नष्ट न करो। कभी भी मौज उड़ानेकी बातें न सोचो' वे ही बगुले-भगत उपदेशक मन्त्री आदि राज्योंसे चोरी करके प्राप्त किये धनसे वेश्याओंके घर भर देते हैं और Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu