भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४२५ वराकाः । येऽपि मन्त्रकर्कशास्तन्त्रकर्तारः शुक्राङ्गिरसविशालाक्षबाहुद- न्तिपुत्रपराशरप्रभृतयस्तैः किमरिषड्वर्गो जितः, कृतं वा तैः शास्त्रानुष्ठा- नम् । तैरपि हि प्रारब्धेषु कार्येषु दृष्टे सिद्धयसिद्धी । पठन्तश्चापठद्भि- रतिसंधीयमाना बहवः । नन्विदमुपपन्नं देवस्य, यदुत सर्वलोकस्य वन्द्या जातिः, अयातयामं वयः, दर्शनीयं वपुः, अपरिमाणा विभूतिः । तत्सर्वं सर्वाविश्वासहेतुना सुखोपभोगप्रतिबन्धिना बहुमार्गविकल्पनात्सर्वकार्ये- ष्वमुक्तसंशयेन तन्त्रावापेन मा कृथा वृथा । सन्ति हि ते दन्तिनां दश सहस्राणि, हयानां लक्षत्रयम् , अनन्तं च पादातम् । अपि च पूर्णान्येव हेमरत्नैः कोशगृहाणि । सर्वश्चैष जीवलोकः समग्रमपि युगसहस्रं तारः । शुक्रः शुक्राचार्यः, आङ्गिरसो बृहस्पतिः, विशालाक्षस्तन्नामधेयो नीतिशास्त्र- कारः बाहुदन्तिपुत्रोऽपि, पराशरः पराशरनीतिकारः । सिद्धयसिद्धी क्वचित् सिद्धिः क्वचिच्चासिद्धिः । पठन्त इति—ये पठनविमुखास्ते पठतो जनान् प्रतारयन्तीत्यर्थः । उपपन्नं सङ्गतं प्राप्तमिति यावत् । देवस्य भवतः । अयातयामं नवम् । दर्शनीयं मनोहरम् । सर्वैस्यादि—तृतीयान्तपदानि तन्त्रावापेनेत्यस्य विशेषणानि । सुखेति— सुखभोगविरोधिना । बहुमार्गेति—नानापथविमर्शनात् । अमुक्तसंशयेन संशय- युक्तेन । तन्त्रः स्वराष्ट्रचिन्ता, आवापः परचिन्ता । कोशगृहाणि धनागाराणि । रेचयिष्यति शून्यीकरिष्यति । किमिदमिति—इदम् एतत्सर्वम् अपर्याप्तमसम्पूर्णं कि ? आनन्द लूटते हैं । अब जो लोग मन्त्रणा देनेवाले उपदेशक, नीतिकुशल, बड़े-बड़े शास्त्रोंके प्रणेता बनते हैं उनकी कृतियोंको तो आप सुनें—शुक्राचार्य, आंगिरस, विशालाक्ष, बाहुदन्तिपुत्र, पराशर प्रभृति प्रमुख नीतिकार माने जाते हैं। क्या इन लोगोंने काम- क्रोधादिपर कभी विजय प्राप्त की ? क्या वे लोग शास्त्रानुसार चलते थे ? क्या उन्होंने आरम्भ किये कार्योंकी सिद्धियाँ वा असिद्धियाँ पूर्वसे ज्ञात कर ली थीं ? कुछ नहीं, इन पढ़े-लिखे धूर्त्तोंने अपढ़ लोगोंको अपना अनुयाया बना लिया है। क्या आपको इसमें आनन्द आ सकता है तथा औचित्य जान पड़ता है कि जगत्में माननीय जाति, सुन्दर शरीर, अतुल सम्पत्ति आदि सभी वस्तुयें इन अविश्वसनीय मन्त्रियोंके चक्करमें पड़कर त्याग दी जायें तथा संसारके समस्त सुखोंको छोड़कर दिन-रात स्वराष्ट्र-परराष्ट्रका चिन्तन करते हुए जीवन व्यतीत किया जाय ? हे महाराज ! आप मेरा कहना मानें और ऐसा न करें । आपके यहाँ दश सहस्र हाथी हैं, तीन लाख घोड़े हैं और असंख्य पैदल सेना है । आपका कोष ( खजाना ) सुवर्ण मणियोंसे परिपूर्ण है । यदि सहस्रों युगों तक आपकी छत्रच्छाया में बैठकर लोग भोजन करें तो भी आपका खजाना कभी खाली न