भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

DevanagariHindipublished474 पृष्ठ

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४२६ दशकुमारचरितम्। [ उत्तरपीठिकायां

भुञ्जानो न ते कोष्ठागाराणि रेचयिष्यति। किमिदमपर्याप्तं यदन्यार्जिता- यासः क्रियते। जीवितं हि नाम जन्मवतां चतुःपञ्चाप्यहानि। तत्रापि भोगयोग्यमल्पालपं वयःखण्डम्। अपण्डिताः पुनर्जन्मन्त एव ध्वंसन्ते। नार्जितस्य वस्तुनो लवमप्यास्वादयितुमीहन्ते। (१४) किं बहुना राज्यभारं भारक्षमेष्वन्तरङ्गेषु भक्तिमत्सु समर्प्य, अप्सरःप्रतिरूपाभिरन्तःपुरिकाभी रममाणो गीतसंगीतपानगोष्ठीश्च यथर्तु बध्नन्यथाहं कुरु शरीरलाभम्' इति पञ्चाङ्गीमृष्टभूमिरञ्जलिचुम्बि- तचूडश्चिरमशेत। प्राहसीच्च प्रीतिफुल्नलोचनोऽन्तःपुरप्रमदाजनः। (१५) जननाथश्च सस्मितम् 'उत्तिष्ठ ननु हितोपदेशाद् गुरवो भव-

नैवेत्यर्थः। अन्यार्जितं परकीयधनं तदर्थम् आ... क्लेशो युद्धादिनेति शेषः। जन्मवतां प्राणिनाम्। अह्नापहपमल्पल्पम्। वयःखण्डायुर्भागः। अपण्डिताः मूर्खाः। जयन्त एव ध्वंसन्ते जित्वाऽपि नाशं गच्छन्ति। (१४) भारक्षमेषु राज्यपालनसमर्थेषु। अन्तरङ्गेषु अमात्येषु। यथर्तु ऋतुमन- तिक्रम्य कालानुरूपमित्यर्थः। बध्नन् कुर्वन्। यथाहं सार्थकमू। शरीरलाभं जन्म। पञ्चाङ्गेति-जानुद्वयं बाहुद्वयं मूर्द्धा चेति पञ्चाङ्गानि तेषां समाहारः पञ्चाङ्गी तया पञ्चभिरङ्गैरित्यर्थः-मृष्टा स्पृष्टा भूमियेन सः, अञ्जलिना चुम्बिता चूडा मौलिर्येन सः। तथाविधो विहारभद्रः। चिरं दीर्घकालं यावत्, अशेत भूमौ पतितोऽतिष्ठत्। (१५) जननाथो राजा अनन्तवर्मा। गुरुत्वविपरीतं दण्डवत्प्रणामकरणमित्यर्थः।

होगा। क्या इतना धन कम है जो धनार्जना वृथा प्रयास किया जाय। प्रत्येक मनुष्यका जीवन चन्द्रिकाके समान चार दिनोंका है। इसमें भी भोगका समय तो बिलकुल ही कम है। मूर्ख लोग तो जन्म लेकर भी मरेके समान हो हैं। वे लोग अपनी अर्जित सम्पत्तिका कुछ भी उपयोग करना नहीं चाहते हैं। (१४) किं बहुना, आप अपने राज्यका भार अपने उन अन्तरंग, विश्वसनीय व्यक्तियोंको देकर, जो आपके ऊपर श्रद्धा रखनेवाले हों तथा राजकार्यमें कुशल हों एवं राज्य संभाल सकें, इन्द्रकी अप्सराओंके समान अन्तःपुरकी रमणियोंके साथ आमोद- प्रमोदपूर्वक गान-वाद्यादिका आनन्द रंगशालामें लूटें तथा ऋतुके अनुकूल सुखभोग भोगकर जीवन सफल बनावें।' ऐसा कहकर वह अपने दोनों हाथ जोड़कर तथा सर्वांगोंको पृथिवीतल पर स्पर्शित कराता हुआ दण्डवत् करने लगा। उसके इन वचनों तथा मुद्राओं को देखकर सभी अन्तःपुरकी वनितायें गद्गद होकर हंस पड़ीं। (१५) मन्दहास्य करते हुए महाराज भी उठकर कहने लगे—'उठो भाई ! यह तुम

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