भारतकोश
दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा)

महाकवि दण्डी द्वारा

स्रोत: दशकुमारचरितम् (सटीक - पूर्वपीठिका व मूल कथा) · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1968 (उद्गम)

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अष्टमोच्छ्वासः ] व्याख्याद्वयोपेतम् । ४२७

न्तः । किमिति गुरुत्वविपरीतमन्विष्ठितम्' इति तमुत्थाप्य क्रीडानिर्भरम- तिष्ठत् । अथैषु दिनेषु भूयोभूयः प्रस्तुतेऽर्थे प्रेर्यमाणो मन्त्रिवृद्धेन, वच- साभ्युपेत्य मनसैवाचित्तज्ञ इत्यवज्ञातवान् । ( १६) अथैवं मन्त्रिणो मनस्यभूत्—'अहो मे मोहाद्वालिश्यम् । अरुचितेऽर्थे चोदयन्नर्थीवाक्षिगतोऽहमस्य हास्यो जातः । स्पष्टमस्य चेष्टानामायथापूर्वम् । तथा हि—न मां स्निग्धं पश्यति, न स्मितपूर्वं भाषते, न रहस्यानि विवृणोति, न हस्ते स्पृशति, न व्यसनेष्वनुकम्पते, नोत्सवेष्वनुगृह्णाति, न विलोभनवस्तु प्रेषयति, न मत्सुकृतानि प्रगण-

प्रस्तुते उपदिष्टे । अर्थे विषये । अभ्युपेत्य स्वीकृत्य । अवज्ञातवान् मन्त्रिवृद्धमिति शेषः । ( (१६) बालिश्यं मूर्खता । अरुचिते अनभीष्टे । अर्थी याचकः । अक्षिगतो द्वेष्यः । हास्यः परिहासविषयः । अयथापूर्वं पूर्वापरवैपरीत्यं, यथापूर्वं न भवतीति अयथापूर्वं तस्य भावः तथा । पूर्वं यथासीदिदानीं न तथेति भावः । रहस्यानि सङ्गोपनीयानि । विवृणोति प्रकाशयति । व्यसनेषु मम विपत्सु । अनुगृह्णाति मयि अनुग्रहं प्रकाशयति । आसन्नकार्येषु उपस्थितकर्मसु । अभ्यन्तरीकरोति नियो- जयति । अनर्हेषु अयोग्येषु । अवष्टभ्यमानमाक्रम्यमाणम् । अनुजानाति अनुमोदते । विश्रम्भं विश्वासम् । प्रतिक्षिपति निषेधति । नयज्ञानां नीतिविदाम् । स्खलितानि

क्या कर रहे हो ? तुम मुझे उचित सम्मति देनेवाले व्यक्ति हो, तुम्हारा ऐसा करना- दण्डवत् करना, अनुचित है । तुम तो मेरे उपदेशकके समान हो । उपदेशकोंको कभी शिष्योंके सामने माथा नहीं टेकना चाहिये ।' ऐसा कहकर महाराजने उसे उठाया और अपने पास बैठाकर स्वयं भी बैठ गये । उन्होंने अपने मनमें विचार किया 'आजकल हमें हमारे सचिवगण वार-वार प्रस्तुत अर्थके लिए जो सम्मतियाँ दे रहे हैं; इसने उन्हीं सम्मतियोंको सुन लिया है तथा उनका आशय न समझकर बड़-बड़ कर रहा है'। अतः उन्होंने उसकी बातोंपर ध्यान ही नहीं दिया । (१६) मन्त्रियोंने अपने मतमें विचार किया—अहो हम लोग कितनी भारी अज्ञता कर रहे हैं कि महाराजसे बार-बार अरुचिकर बातें कहते हैं । हमारे वार-बार ऐसे कथनसे वे महाराज हमें भिखारी समझते हैं और हँसी उड़ाते हैं । उनका जो व्यवहार हमारे साथ पहले होता था वह अब नहीं होता । यहाँतक कि वे हमें अब प्रेमपूर्ण दृष्टिसे नहीं देखते हैं, हमसे हँसकर बोलते भी नहीं हैं । अपने चित्तकी बातें भी नहीं बताते हैं । बात करते समय तक भी हमारा स्पर्श नहीं करते हैं। हमें कष्टमें जानकर भी कृपा नहीं करते । हमारे यहाँ महोत्सवों तकमें नहीं सम्मिलित होते । न तो हमारे घर की कुशलता

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