देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 757, कुल 889 में से
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| ७४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ये याज्ञिकाः सकलवेदविदोऽपि नूनं<br>त्वां संस्मरन्ति सततं किल होमकाले।<br>स्वाहां तु तृप्तिजननीममरेश्वराणां<br>भूयः स्वधां पितृगणस्य च तृप्तिहेतुम्॥ ४८ | समस्त वेदोंमें पारंगत वे यज्ञकर्ता भी निश्चय ही धन्य हैं, जो हवनके समय देवताओंको तृप्ति देनेवाली स्वाहा और पितरोंको तृप्ति देनेवाली स्वधाके रूपमें आपका निरन्तर स्मरण करते हैं॥ ४८ ॥ |
| मेधासि कान्तिरसि शान्तिरपि प्रसिद्धा<br>बुद्धिस्त्वमेव विशदार्थकरी नराणाम्।<br>सर्वं त्वमेव विभवं भुवनत्रयेऽस्मिन्-<br>कृत्वा ददासि भजतां कृपया सदैव॥ ४९ | आप ही मेधा हैं, आप ही कान्ति हैं, आप ही शान्ति हैं और मनुष्योंका महान् मनोरथ पूर्ण करनेवाली प्रख्यात बुद्धि भी आप ही हैं। समस्त ऐश्वर्यकी रचना करके आप इस त्रिलोकीमें कृपा करके अपनी आराधना करनेवालेको वैभव प्रदान करती रहती हैं॥ ४९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी प्रत्यक्षा साभवत्तदा।<br>चारुरूपधरा तन्वी सर्वाभरणभूषिता॥ ५० | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर वे भगवती प्रकट हो गयीं। उन्होंने सुन्दर रूप धारण कर रखा था, वे कोमल विग्रहवाली थीं और समस्त आभूषणोंसे सुसज्जित थीं॥ ५० ॥ |
| पाशांकुशवराभीतिलसद्बाहुचतुष्टया ।<br>रणत्किङ्किणिकाजालरसनाबद्धसत्कटिः ॥ ५१ | वे पाश, अंकुश, वर और अभयमुद्रासे सुशोभित चार भुजाओंसे युक्त थीं, उनकी कमरमें बँधी हुई करधनीके घुँघरू बज रहे थे॥ ५१ ॥ |
| कलकण्ठीरवा कान्ता क्वणत्कङ्कणनूपुरा।<br>चन्द्रखण्डसमाबद्धरत्नमौलिर्विराजिता ॥ ५२ | उन कान्तिमयी भगवतीकी ध्वनि कोयलके समान थी, उनके हाथोंके कंकण और चरणोंके नूपुर बज रहे थे। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रसे मण्डित रत्नमुकुट सुशोभित हो रहा था॥ ५२ ॥ |
| मन्दस्मितारविन्दास्या नेत्रत्रयविभूषिता।<br>पारिजातप्रसूनाच्छनालवर्णसमप्रभा ॥ ५३ | वे मन्द-मन्द मुसकरा रही थीं, उनका मुख कमलके समान सुशोभित हो रहा था, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थीं तथा पारिजातके पुष्प-नालकी भाँति उनके शरीरकी कान्ति रक्तवर्ण थी॥ ५३ ॥ |
| रक्ताम्बरपरीधाना रक्तचन्दनचर्चिता।<br>प्रसादसुमुखी देवी करुणारससागरा॥ ५४<br><br>सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वद्वैतारणिः परा।<br>सर्वज्ञा सर्वकर्त्री च सर्वाधिष्ठानरूपिणी॥ ५५<br><br>सर्ववेदान्तसंसिद्धा सच्चिदानन्दरूपिणी।<br>प्रणेमुस्तां समालोक्य सुरा देवीं पुरःस्थिताम्॥ ५६<br>तानाह प्रणतानम्बा किं वः कार्यं ब्रुवन्तु माम्। | वे लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थीं और उनके शरीरपर रक्त चन्दन अनुलिप्त था। करुणारसकी सागर वे भगवती प्रसन्न मुख-मण्डलसे शोभा पा रही थीं। वे समस्त शृंगार-वेषसे विभूषित थीं। वे देवी द्वैतभावके लिये अरणीस्वरूपा, परा, सब कुछ जाननेवाली, सबकी रचना करनेवाली, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा, सभी वेदान्तोंद्वारा प्रतिपादित और सच्चिदानन्दरूपिणी हैं। उन देवीको अपने सम्मुख स्थित देखकर देवताओंने उन्हें प्रणाम किया। तब उन प्रणत देवताओंसे भगवती अम्बिकाने कहा—आपलोग मुझे अपना कार्य बतायें॥ ५४—५६ १/२ ॥ |