भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० ६ ] षष्ठ स्कन्ध ७५३


| व्यास उवाच<br>एवं प्रबोधितः पित्रा वचनैर्हेतुसंयुतैः ॥ ४८<br>न बुबोध तदा वृत्र आसन्नमरणः किल। | व्यासजी बोले— इस प्रकार पिताद्वारा कल्याणकारी वचनोंसे समझाये जानेपर भी आसन्न-मृत्यु वृत्रासुरको कुछ भी चेत नहीं हुआ॥ ४८ १/२ ॥ | | स कदाचित्समुद्रान्ते तमपश्यन्महासुरम्॥ ४९<br>सन्ध्याकाल उपावृत्ते मुहूर्तेऽतीव दारुणे।<br>ततः सञ्चिन्त्य मघवा वरदानं महात्मनाम्॥ ५०<br>सन्ध्येयं वर्तते रौद्रा न रात्रिर्दिवसो न च।<br>हन्तव्योऽयं मया चाद्य बलेनैव न संशयः॥ ५१ | एक दिन उन्होंने (इन्द्रने) उस महान् दैत्यको समुद्रके तटपर देखा। उस समय संध्याकालका अत्यन्त भयंकर मुहूर्त उपस्थित था। तब इन्द्रने महात्मा मुनियोंद्वारा निर्धारित शर्त—वरदानपर यह विचार करके कि यह भयंकर संध्याकाल है, इस समय न दिन है, न रात है, अतः मुझे आज ही इसे अपनी शक्तिसे मार डालना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४९—५१॥ | | एकाकी विजने चात्र सम्प्राप्तः समयोचितः।<br>एवं विचार्य मनसा सस्मार हरिमव्ययम्॥ ५२<br>तत्राजगाम भगवानदृश्यः पुरुषोत्तमः।<br>वज्रमध्ये प्रविश्यासौ संस्थितो भगवान्हरिः॥ ५३ | यहाँ एकान्त है और यह अकेला है तथा समय भी अनुकूल है—ऐसा विचारकर उन्होंने अपने मनमें अविनाशी भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया। [स्मरण करते ही] पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु वहाँ अदृश्यरूपसे आ गये और वे प्रभु श्रीहरि इन्द्रके वज्रमें प्रविष्ट होकर विराजमान हो गये॥ ५२-५३॥ | | इन्द्रो बुद्धिं चकाराशु तदा वृत्रवधं प्रति।<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा कथं हन्यां रिपुं रणे॥ ५४<br>अजेयं सर्वथा सर्वदेवैश्च दानवैस्तथा।<br>यदि वृत्रं न हन्यद्य वञ्चयित्वा महाबलम्॥ ५५<br>न श्रेयो मम नूनं स्यात्सर्वथा रिपुरक्षणात्।<br>अपां फेनं तदापश्यत्समुद्रे पर्वतोपमम्॥ ५६ | तब इन्द्र वृत्रासुरको मारनेकी युक्ति सोचने लगे कि सभी देवताओं तथा दानवोंसे सर्वथा अजेय इस शत्रुको युद्धमें कैसे मारूँ? यदि छल करके इस महाबलीको आज नहीं मारता तो इस शत्रुके जीवित रहते किसी भी प्रकार कल्याण नहीं है। इन्द्र ऐसा विचार कर ही रहे थे तभी उन्होंने समुद्रमें पर्वतके समान जलफेनको देखा॥ ५४—५६॥ | | नायं शुष्को न चार्द्रोऽयं न च शस्त्रमिदं तथा।<br>अपां फेनं तदा शक्रो जग्राह किल लीलया॥ ५७ | यह न सूखा है, न गीला है और यह न तो कोई शस्त्र है, [ऐसा विचारकर] इन्द्रने उस समुद्रफेनको लीलापूर्वक उठा लिया॥ ५७॥ | | परां शक्तिं च सस्मार भक्त्या परमया युतः।<br>स्मृतमात्रा तदा देवी स्वांशं फेने न्यधापयत्॥ ५८ | तदनन्तर उन्होंने परम भक्तिपूर्वक, पराशक्ति जगदम्बाका स्मरण किया, तब स्मरण करते ही देवीने अपना अंश उस फेनमें स्थापित कर दिया॥ ५८॥ | | वज्रं तदावृतं तत्र चकार हरिसंयुतम्।<br>फेनावृतं पविं तत्र शक्रश्चिक्षेप तं प्रति॥ ५९ | इन्द्रने भगवान् श्रीहरिसे युक्त वज्रको उस फेनसे आवृत कर दिया और उस फेनसे आवृत वज्रको वृत्रासुरके ऊपर फेंका॥ ५९॥ | | सहसा निपपाताशु वज्राहत इवाचलः।<br>वासवस्तु प्रहृष्टात्मा बभूव निहते तदा॥ ६० | उस वज्रके अचानक प्रहारसे वह पर्वतकी भाँति गिर पड़ा। तब उसके मर जानेपर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो उठे | | ऋषयश्च महेन्द्रं तमस्तुवन्विविधैः स्तवैः।<br>हतशत्रुः प्रहृष्टात्मा वासवः सह दैवतैः॥ ६१ | और ऋषिगण विविध स्तोत्रोंसे देवराज इन्द्रकी स्तुति करने लगे। उस शत्रुके मारे जानेसे प्रसन्नचित्त इन्द्रने देवताओंके साथ उन भगवतीकी |