भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 764

अ० ७ ] षष्ठ स्कन्ध [ ७५५

श्लोकअर्थ
धिगियं ममता पापमूलमेवमनर्थकृत्।<br>यदस्माभिश्चलं कृत्वा शपथैर्वञ्चितोऽसुरः॥ ५पापकी जड़ और अनर्थकारी इस ममताको धिक्कार है, जिसके कारण हमलोगोंने छलपूर्वक शपथ ली और उस असुर (वृत्रासुर)-को धोखा दिया॥ ५॥
मन्त्रकृद् बुद्धिदाता च प्रेरकः पापकारिणाम्।<br>पापभाक्स भवेन्नूनं पक्षकर्ता तथैव च॥ ६पाप करनेका परामर्श देनेवाला, पाप करनेके लिये बुद्धि देनेवाला, पापकी प्रेरणा देनेवाला तथा पाप करनेवालोंका पक्ष लेनेवाला भी निश्चय ही पापकर्ताके समान पापभाजन होता है॥ ६॥
विष्णुनापि कृतं पापं यत्साहाय्यमवाप्तवान्।<br>वज्रं प्रविश्य येनासौ पातितः सत्त्वमूर्त्तिना॥ ७वज्रमें प्रविष्ट होकर वृत्रकी हत्या करनेमें सत्त्वगुणके मूर्तरूप भगवान् विष्णुने इन्द्रकी सहायता की और उसे मारा, अतः उन्होंने भी पाप किया॥ ७॥
नूनं स्वार्थपरः प्राणी न पापात् त्रासमश्नुते।<br>हरिणा हरिसङ्गेन सर्वथा दुष्कृतं कृतम्॥ ८स्वार्थपरायण प्राणी पापसे भयभीत नहीं होता। विष्णुने इन्द्रका साथ देकर सर्वथा दुष्कृत कर्म किया॥ ८॥
द्वावेव स्तः पदार्थानां द्वावेव निधनं गतौ।<br>प्रथमश्च तुरीयश्च यौ त्रिलोक्यां तु दुर्लभौ॥ ९चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष)-मेंसे दो ही रह गये हैं और दो समाप्त हो गये हैं। उनमें भी प्रथम पदार्थ धर्म और चतुर्थ पदार्थ मोक्ष दोनों त्रिलोकमें दुर्लभ ही हो गये हैं॥ ९॥
अर्थकामौ प्रशस्तौ द्वौ सर्वेषां सम्मतौ प्रियौ।<br>धर्माधर्मेति वाग्वादो दम्भोऽयं महतामपि॥ १०अर्थ और काम ही सबके प्रिय और प्रशस्त माने गये हैं। धर्म और अधर्मकी विवेचना—यह बड़े लोगोंका वाचिक दम्भमात्र ही रह गया है॥ १०॥
मुनयोऽपि मनस्तापमेवं कृत्वा पुनः पुनः।<br>जग्मुः स्वानाश्रमानेव विमनस्का हतोद्यमाः॥ ११इस प्रकार मुनिगण भी बार-बार मनमें सन्ताप करके उदासमनसे हतोत्साह होकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये॥ ११॥
त्वष्टा तु निहतं श्रुत्वा पुत्रमिन्द्रेण भारत।<br>रुरोद दुःखसन्तप्तो निर्वेदमगमत्पुनः॥ १२हे भारत! उधर अपने पुत्रको इन्द्रद्वारा मारा गया सुनकर त्वष्टा दुःखसे सन्तप्त होकर अत्यन्त दुःखित हो रोने लगे; उन्हें इससे बहुत वेदना हुई॥ १२॥
यत्रासौ पतितस्तत्र गत्वा वीक्ष्य तथागतम्।<br>संस्कारं कारयामास विधिवत्पारलौकिकम्॥ १३तदनन्तर जहाँ वह (वृत्र) गिरा पड़ा था, वहाँ जाकर उसे उस स्थितिमें देखकर त्वष्टाने विधिपूर्वक उसका पारलौकिक संस्कार कराया॥ १३॥
स्नात्वास्य सलिलं दत्त्वा कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।<br>शशापेन्द्रं स शोकार्तः पापिष्ठं मित्रघातकम्॥ १४<br><br>यथा मे निहतः पुत्रः प्रलोभ्य शपथैर्भृशम्।<br>तथेन्द्रोऽपि महद्दुःखं प्राप्नोतु विधिनिर्मितम्॥ १५तत्पश्चात् स्नान करके, जलाञ्जलि देकर उसका और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न करनेके पश्चात् उन शोकसन्तप्त त्वष्टाने पापी और मित्रघाती इन्द्रको इस प्रकार शाप दे दिया कि जिस प्रकार शपथोंसे प्रलोभितकर इन्द्रने मेरे पुत्रको मार डाला है, उसी प्रकार वह भी विधाताद्वारा दिये हुए महान् दुःख प्राप्त करे॥ १४–१५॥