धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ धनुर्वेदसंहिता प्रथम, तीसरे, छठे, सातवें, दशवें, ग्यारहवें चन्द्रमा में आचार्य धनुर्विद्या के सारे काम करवावे॥१२॥ तृतीया पंचमी चैव सप्तमी दशमी तथा । त्रयोदशी द्वादशी च तिथयस्तु शुभा मताः ॥१३॥ तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी और द्वादशी ये तिथियां शुभ हैं॥१३॥ रविवारः शुक्रवारो गुरुवारस्तथैव च । एतद्वारत्रयं धन्यं प्रारम्भे शस्त्रकर्मणाम् ॥१४॥ रवि, शुक्र, गुरु, शस्त्रों के प्रारम्भ कर्म में ये तीन वार सराहने योग्य हैं॥१४॥ एभिर्दिनैस्तु शिष्याय गुरुः शस्त्राणि दापयेत् । संतर्प्य दानहोमाभ्यां सुरान्स्वाहाविधानतः ॥१५॥ गुरु इन दिनों में दान और होम करके देवताओं को तृप्त कर शिष्य को शस्त्र दे॥१५॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्तत्र कुमारीश्चाप्यनेकंशः । तापसानर्चयेद्भक्त्या ये चान्ये शिवयोगिनः ॥१६॥ वहां अनेक ब्राह्मण और कन्याओं को जिमावे और जो शिव के भक्त योगी हों उनको भक्ति से अर्चन पूजन करै॥१६॥ अन्नपानादिभिश्चैव वस्त्रालङ्कारभूषणैः । गन्धमाल्यैर्विचित्रैश्च गुरुं तत्र प्रपूजयेत् ॥१७॥ पीछे गन्ध माला अन्नादि वस्त्र गहने आदि से गुरुजी का पूजन करे॥१७॥ कृतोपवासः शिष्यस्तु धृताजिनपरिग्रहः । बद्धांजलिपुटस्तत्र याचयेद्गुरुतो धनुः ॥१८॥ उपवास किया हुआ शिष्य मृगचर्म धारण किये हुए हाथ जोड़कर गुरु से धनुष की याचना करे॥१८॥ अङ्गन्यासस्ततः कार्यः शिवोक्तः सिद्धिमिच्छता । आचार्येण च शिष्यस्य पापघ्नो विघ्ननाशनः ॥१९॥