भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासमेता ९ गलग्रन्थि तलग्रन्थि धनहानिकरं धनुः ॥ एभिर्दोषैर्विनिर्मुक्तं सर्वकार्यकरं स्मृतम् ॥४३॥ विना पके बांस वा सींग, सोना, चांदी, तांबा, लोहा इस्पात आदि का धनुष टूट जाता है, इसलिये पहिले अजमाया हुआ धनुष न हो तो भंग हो जाता है और बहुत पुराना तो कैड़ा हो जाता है और जाति के बांस का न हो तो मन में युद्ध के समय उद्वेग करता है, अर्थात् मन को उलट पुलट कर देता है, और भाइयों कें साथ लड़ाई, जले हुए धनुष के धारण करने से घर जल जाता है, छिद्र सहित से युद्ध का नाश हो जाता है, क्योंकि मन में यही चिन्ता लगी रहती कि, कभी टूट न जाय, युद्ध समय अन्य चिन्ता होने से शीघ्र बाण नहीं चल सकते इसलिये हार जाता है और जिस धनुष के बाहर हाथ चला जाय तो निशाना नहीं दीखे और वैसे ही भीतर हाथ रह जाय तो भी निशाना नहीं दीखे, यदि ओछा बाण चढ़ावे तो संग्राम में भंगकारक है और गुणा से टका हुआ हो तो फिर दृढ़ निशाना नहीं लगे और गलग्रंथि तथा तलग्रंथि ये दोनों धनुष धन की हानि करने वाले हैं, इन दोषों से रहित धनुष सब कामों का करने वाला होता है॥४०-४३॥ शार्ङ्गं पुनर्धनुर्दिव्यं विष्णोः परममायुधम् । वितस्तिसप्तमं मानं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥४४॥ फिर विष्णु भगवान् का परम दिव्य आयुध शार्ङ्गधनुष विश्वकर्मा ने सात बालिशत का बनाया॥४४॥ न स्वर्गे न च पाताले न भूमौ कस्यचित्करे । तद्धनुर्वशमायाति मुक्त्वैकं पुरुषोत्तमम् ॥४५॥ स्वर्ग में न पाताल में न पृथ्वीपर किसी के हाथ में वह है और न वह किसी के वश में आता है, एक भगवान् को छोड़कर॥४५॥ पौरुषेयं तु यच्छाङ्गं बहुवत्सरशोभितम् । वितस्तिभिः सार्द्धषड्भिर्निर्मितं चार्थसाधनम् ॥४६॥ एक पुरुष का जो धनुष है वह अच्छा बहुत वर्षों का है और छः बालिशत और छः अंगुलका बनाया हुआ धनुष धनका साधन देने वाला है॥४६॥