दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ दोहावली भावार्थ—चातकके चित्तमें अपने प्रियतम मेघका दोष कभी आता ही नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि इसीलिये प्रेमके अथाह समुद्रका कोई माप-तौल नहीं हो सकता (उसका थाह नहीं लगाया जा सकता) ॥२८१॥ बरषि परुष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक। तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक ॥२८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ (बादल) कठोर ओले बरसाकर भले ही चातककी पांखोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे, पर प्रेमके प्रणमें चतुर चातकको अपने प्रेमका प्रण निबाहनेमें कभी भूल नहीं करनी चाहिये ॥२८२॥ उपल बरषि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर। चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर ॥२८३॥ भावार्थ—मेघ कड़क-कड़ककर गर्जता हुआ ओले बरसाता है और कठोर बिजली भी गिरा देता है; इतनेपर भी प्रेमी पपीहा मेघको छोड़कर क्या कभी किसी दूसरी ओर ताकता है ? ॥२८३॥ पबि पाहन दामिनि गरज झरि झकोर खरि खीझि। रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि ॥२८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ बिजली गिराकर, ओले बरसाकर, बिजली चमकाकर, कड़क-कड़ककर, वर्षाकी झड़ी लगा- कर और आंधीके झकोरे देकर अपना बड़ा भारी रोष प्रकट करता है; परंतु चातकको अपने प्रियतमका दोष देखकर क्रोध नहीं होता (उसे दोष दीखता ही नहीं), बल्कि इसमें भी वह अपने प्रति मेघका अनुराग देखकर उसपर रीझ जाता है ॥२८४॥