दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ दोहावली चातकने चोंचको उलट कर ऊपर उठा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि चातकके प्रेमरूपी वस्त्रपर मरते दमतक कोई खोंच नहीं लगी (वह कहींसे फटा नहीं) ॥३०२॥ अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि। गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि ॥३०३॥ भावार्थ—किसी चातकने अंडेको फोड़कर उसमेंसे बच्चा निकाला, परंतु अंडेके छिलकेको पानीमें पड़ा हुआ देखकर उस [प्रेमराज्यके] चतुर चातकने, तुरंत उसे पंजेसे पकड़कर जलसे बाहर फेंक दिया ॥३०३॥ तुलसी चातक देत सिख सुतहि बारहीं बार। तात न तर्पण कीजिए बिना बारिधर धार ॥३०४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक अपने पुत्रको वारंबार यही सीख देता है कि हे तात! [मेरे मरने पर] प्यारे मेघ की धाराको छोड़कर अन्य किसी जलसे मेरा तर्पण न करना ॥३०४॥ सोरठा जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहिं। सुरसरिहू को बारि मरत न माँगेउ अरध जल ॥३०५॥ भावार्थ—जीते-जी तो चातकने [प्यारे] मेघको छोड़कर दूसरेके सामने गर्दन नहीं झुकायी (याचना नहीं की) और मरते समय भी गङ्गाजलमें* अर्धजलीतक न माँगी (मुक्तिका भी निरादर कर दिया) ॥३०५॥ *मरते हुए आदमीको आधा गङ्गाजीमें और आधा बाहर रखते हैं, इसको 'अर्धजल' क्रिया कहते हैं। इस अवस्थामें जिसके प्राण छूटते हैं, उसकी सहज मुक्ति हो जाती है—ऐसा शास्त्रोंमें वर्णन आता है।