भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

दोहावली १०१ भावार्थ—न तो चातक ही पापी है और न जीवनदाता मेघ ही मूर्ख है। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रह्लादकी दशापर विचार करके समझो कि प्रेमका मार्ग कितना गूढ़ (सूक्ष्म) है। (प्रह्लादको पद-पद- पर कष्ट मिलता है और भगवान् उसके कष्टको जानते हुए भी बहुत विलम्बसे प्रकट होते हैं। यह उनकी प्रेमलीला ही है।) ॥२९९॥ गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि । तुलसी चातक चतुर सो जाचक जानि सुदानि ॥३००॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, कि अपनी-अपनी गरज सभी को होती है और उसी गरजको (कामनाको) हृदयमें रखकर लोग जहाँ-तहाँ गरज करते (सबसे विनती करते) फिरते हैं। परंतु चतुर (अनन्य प्रेमी) चातक तो एक मेघको ही सर्वोत्तम दानी समझकर केवल उसीका याचक बना ॥३००॥ चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर । तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर ॥३०१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बाजके पंजेमें फँसनेपर चातकको अपने प्रेमके नियमकी पीड़ा (चिन्ता) होती है। [उसे यह चिन्ता नहीं होती कि मैं मर जाऊँगा, पर इस बातकी बड़ी पीड़ा होती है कि बाजके द्वारा मारे जानेपर] मेरी हड्डियाँ और पाँख [स्वाती-नक्षत्रमें मेघ-जलमें न पड़कर] पृथ्वीके साधारण जलमें पड़ेगा ॥३०१॥ बध्यो बधिक परचो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच । तुलसी चातक प्रेम पट मरतहूँ लगी न खोंच ॥३०२॥ भावार्थ—किसी बहेलियेने चातकको मार दिया, वह पुण्य- सलिल गङ्गाजीमें गिर पड़ा; परंतु गिरते ही उस अनन्य प्रेमी