दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० दोहावली मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर । सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भरि तोर ॥२६६॥ भावार्थ—कोयल, मोर और चकोर मुँहके तो मीठे होते हैं; परंतु मनके बड़े मैले होते हैं (बोली तो बड़ी मीठी बोलते हैं, पर कीट-सर्पादि जीवोंको खा जाते हैं) परंतु हे नवल चातक ! विश्व- भरमें निर्मल यश तो तेरा ही छाया हुआ है ॥ २६६ ॥ बास बेस बोलनि चलनि मानस मंजु मराल । तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल ॥२६७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हंसका निवासस्थान (मानसरोवर), वेष (रंग-रूप), बोली, चाल और [नीर-क्षीरका विवेक रखनेवाला तथा मोती चुगनेकी टेकवाला] मन सभी सुन्दर हैं, परंतु प्रेमकी कीर्ति तो सबसे बढ़कर विस्तृत और निर्मल चातक- की ही है ॥ २६७ ॥ प्रेम न परखिअ परुषपन पयद सिखावन एह । जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह ॥२६८॥ भावार्थ—संसारके लोग (विषयीजन) कहते हैं कि चातक पापी है, क्योंकि मेघ ऊसरतकमैं बरसता है [परंतु चातकके मुँहमें नहीं बरसता]; पर मेघ इससे यह शिक्षा देता है कि प्रेमकी परीक्षा कठोरतासे नहीं करनी चाहिये (अर्थात् कठोरतामें प्रेम नहीं है, ऐसा नहीं मानना चाहिये; कहीं-कहीं कठोरतामें ही प्रेमका प्रकाश होता है। चातक पापी नहीं है, महान् प्रेमी है; उसके प्रेमका यश मेघकी कठोरतासे बढ़ता है) ॥ २६८ ॥ होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़ । तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़ ॥२६९॥