दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिये सुखदायिनी होती है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक- की-सी रीझ (प्रेम) और मेघकी-सी बुद्धि किसी विरले ही बुद्धिमान्की होती है (चातक मेघपर इतना रीझा रहता है कि कष्ट सहनेपर भी : उससे प्रेम बढ़ाता ही है और मेघकी ऐसी बुद्धिगुणज्ञता है कि वह दाता होकर भी ऋणी बन जाता है।) ॥ २६२ ॥ चातक जीवन दायकहि जीवन समयँ सुरीति । तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति ॥२९३॥ भावार्थ—चातकके जीवनदाता मेघके प्रेमकी सुन्दर रीति तो उसके जीवनकालमें ही देखनेमें आती है; परंतु [अनन्य प्रेमी] चातकका प्रेम एवं विश्वास तो अलख (अज्ञेय) है, तुलसीदासजी कहते हैं, वह तो किसीके लखनेमें ही नहीं आता (अर्थात् उसका प्रेम तो मरते समय भी बना रहता है)—(देखिये दो० ३०२, ३०४, ३०५) ॥ २६३ ॥ जीव चराचर जहाँ लगें हैं सब को हित मेह । तुलसी चातक मन बस्यो घन सौं सहज सनेह ॥२९४॥ भावार्थ—संसारमें जितने चर-अचर जीव हैं, मेघ उन सभीका हितकारी है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि उस मेघके प्रति स्वाभाविक स्नेह तो एक चातकके ही चित्तमें बसा हुआ है ॥२६४॥ डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरिन बारि । सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि ॥२९५॥ भावार्थ—वनमें बहुत-से पक्षी डोलते हैं और वे पोखरियोंका जल पिया करते हैं; परंतु हे नित्य नवीन प्रेमी चातक ! चौदहों लोकोंको अपने निर्मल यशसे उज्ज्वल तो एक तू ही करता है ॥२६५॥