भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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९० दोहावली धन और ऐश्वर्यके मद तथा कामकी व्यापकता श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥२६२॥ भावार्थ-धनके मदने किसको टेढ़ा नहीं कर दिया, प्रभुताने किसको बहरा नहीं बना दिया और मृगलोचनी (सुन्दर स्त्री) के नयन-बाण ऐसा कौन है, जिनको नहीं लगे ? ॥२६२॥ मायाकी फौज ब्यापि रहेउ संसार महँ माया कटक प्रचंड । सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाखंड ॥२६३॥ भावार्थ-मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभरमें फैल रही है, कामादि (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर) वीर इस सेनाके सेनापति हैं और दम्भ, कपट, पाखण्ड उसके योद्धा हैं ॥२६३॥ काम, क्रोध, लोभकी प्रबलता तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ । मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महूँ छोभ ॥२६४॥ भावार्थ-हे तात ! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन दुष्ट बड़े ही बलवान् हैं, ये विज्ञानसम्पन्न मुनिके मनमें भी पलक मारते-मारते क्षोभ उत्पन्न कर देते हैं ॥२६४॥ काम, क्रोध, लोभके सहायक लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि । क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥२६५॥ भावार्थ-श्रेष्ठ मुनि विचारकर कहते हैं कि लोभके इच्छा और