भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १५ भावार्थ—एक ही भरोसा है, एक ही बल है, एक ही आशा है और एक ही विश्वास है। एक रामरूपी श्यामघन (मेघ) के लिये ही तुलसीदास चातक बना हुआ है ॥२७७॥ प्रेमकी अनन्यताके लिये चातकका उदाहरण जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास । तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस ॥२७८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामरूपी मेघ ! चाहे तुम ठीक समयपर बरसो (कृपाकी दृष्टि करो) चाहे जन्मभर उदासीन रहो—कभी न बरसो, परंतु इस चित्तरूपी चातकको तो तुम्हारी ही आशा है ॥२७८॥ चातक तुलसीके मतें स्वातिहुँ पिएँ न पानि । प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि ॥२७९॥ भावार्थ—हे चातक ! तुलसीदासके मतसे तो तू स्वाति नक्षत्रमें बरसा हुआ जल भी न पीना ! क्योंकि प्रेमकी प्यासका बढ़ते रहना ही अच्छा है; घटनेसे तो प्रेमकी निष्ठा ही घट जायगी ॥२७९॥ रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग । तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग ॥२८०॥ भावार्थ—अपने प्यारे मेघका नाम रटते-रटते चातककी जीभ लट गयी और प्यासके मारे सब अङ्ग सूख गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि तो भी चातकके प्रेमका रंग तो नित्य नया और सुन्दर ही होता जाता है ॥२८०॥ चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष । तुलसी प्रेम पयोधि की ताते नाप न जोख ॥२८१॥