दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ दोहावली भावार्थ—जो लोग दुष्टोंको ज्ञानका उपदेश देना, संसारका सुधार करना, मनका निरोध करना और कुलको शुद्ध करना चाहते हैं, वे व्यर्थ ही परिश्रम करते हुए मर जाते हैं; उन्हें स्वप्नमें भी सुख या सुन्दर ज्ञान नहीं मिलता। [अतएव इन सब कार्योंके पीछे न पड़कर संतोषपूर्वक श्रीभगवान्का भजन करना चाहिये] ॥२७४॥ संतोषकी महिमा सोरठा कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु । चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥२७५॥ भावार्थ—स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? चाहे करोड़ों प्रकारसे जतन करते-करते कोई मर जाय, परंतु जलके बिना सूखी जमीनपर क्या कभी नाव चल सकती है? ॥२७५॥ मायाकी प्रबलता और उसके तरनेका उपाय सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल । अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥२७६॥ भावार्थ—जिसे भगवान्की प्रबल माया मोहित न कर दे ऐसा देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी नहीं है। यों मनमें विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीरामका भजन करना चाहिये ॥२७६॥ गोस्वामीजीकी अनन्यता दोहा एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास । एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥२७७॥