दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ९३ किसके मनको शान्ति नहीं मिलती ? ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम । भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥२७२॥ भावार्थ—जो मनुष्य मोहके वशीभूत होकर भूतप्राणियोंके द्रोहमें तत्पर है, श्रीरामसे विमुख है और भोगोंमें आसक्त हो रहा है; उसको क्या स्वप्नमें भी [दैवी] सम्पत्ति, शुभ शकुन या चित्तकी शान्ति प्राप्त हो सकती है ? ॥२७२॥ ज्ञानमार्गकी कठिनता कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक । होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥२७३॥ भावार्थ—ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन है, समझनेमें कठिन है और साधन करनेमें भी कठिन है। यदि 'घुणाक्षर' न्यायसे* कहीं ज्ञान प्राप्त भी हो जाय तो फिर भी उस [के बचाये रखने] में अनेकों विघ्न आते रहते हैं। (तात्पर्य यह है कि कहीं गुरुकृपासे परोक्ष ज्ञान हो ही जाता है, तो फिर भी अपरोक्षतक पहुँचनेमें बहुत-सी बाधाएँ आती हैं) ॥२७३॥ भगवद्भजनके अतिरिक्त और सब प्रयत्न व्यर्थ हैं खल प्रबोध जग सोध मन को निरोध कुल सोध । करहिं ते फोटक पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध॥२७४॥ *काठमें जब घुन लग जाता है और उसे काटता है, तब उसमें कई तरहकी रेखाएँ बन जाती हैं। संयोगसे कोई रेखा अक्षर-जैसी बन जाय तो उसे 'घुणाक्षर' कहते हैं। इसी प्रकार बिना प्रयत्नके संयोगवश कोई घटना हो जाय तो उसे 'घुणाक्षर-न्याय' कहते हैं।