दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
दोहावली ९३ किसके मनको शान्ति नहीं मिलती ? ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम । भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥२७२॥ भावार्थ—जो मनुष्य मोहके वशीभूत होकर भूतप्राणियोंके द्रोहमें तत्पर है, श्रीरामसे विमुख है और भोगोंमें आसक्त हो रहा है; उसको क्या स्वप्नमें भी [दैवी] सम्पत्ति, शुभ शकुन या चित्तकी शान्ति प्राप्त हो सकती है ? ॥२७२॥ ज्ञानमार्गकी कठिनता कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक । होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥२७३॥ भावार्थ—ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन है, समझनेमें कठिन है और साधन करनेमें भी कठिन है। यदि 'घुणाक्षर' न्यायसे* कहीं ज्ञान प्राप्त भी हो जाय तो फिर भी उस [के बचाये रखने] में अनेकों विघ्न आते रहते हैं। (तात्पर्य यह है कि कहीं गुरुकृपासे परोक्ष ज्ञान हो ही जाता है, तो फिर भी अपरोक्षतक पहुँचनेमें बहुत-सी बाधाएँ आती हैं) ॥२७३॥ भगवद्भजनके अतिरिक्त और सब प्रयत्न व्यर्थ हैं खल प्रबोध जग सोध मन को निरोध कुल सोध । करहिं ते फोटक पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध॥२७४॥ *काठमें जब घुन लग जाता है और उसे काटता है, तब उसमें कई तरहकी रेखाएँ बन जाती हैं। संयोगसे कोई रेखा अक्षर-जैसी बन जाय तो उसे 'घुणाक्षर' कहते हैं। इसी प्रकार बिना प्रयत्नके संयोगवश कोई घटना हो जाय तो उसे 'घुणाक्षर-न्याय' कहते हैं।
९४ दोहावली भावार्थ—जो लोग दुष्टोंको ज्ञानका उपदेश देना, संसारका सुधार करना, मनका निरोध करना और कुलको शुद्ध करना चाहते हैं, वे व्यर्थ ही परिश्रम करते हुए मर जाते हैं; उन्हें स्वप्नमें भी सुख या सुन्दर ज्ञान नहीं मिलता। [अतएव इन सब कार्योंके पीछे न पड़कर संतोषपूर्वक श्रीभगवान्का भजन करना चाहिये] ॥२७४॥ संतोषकी महिमा सोरठा कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु । चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥२७५॥ भावार्थ—स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? चाहे करोड़ों प्रकारसे जतन करते-करते कोई मर जाय, परंतु जलके बिना सूखी जमीनपर क्या कभी नाव चल सकती है? ॥२७५॥ मायाकी प्रबलता और उसके तरनेका उपाय सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल । अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥२७६॥ भावार्थ—जिसे भगवान्की प्रबल माया मोहित न कर दे ऐसा देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी नहीं है। यों मनमें विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीरामका भजन करना चाहिये ॥२७६॥ गोस्वामीजीकी अनन्यता दोहा एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास । एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥२७७॥
दोहावली १५ भावार्थ—एक ही भरोसा है, एक ही बल है, एक ही आशा है और एक ही विश्वास है। एक रामरूपी श्यामघन (मेघ) के लिये ही तुलसीदास चातक बना हुआ है ॥२७७॥ प्रेमकी अनन्यताके लिये चातकका उदाहरण जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास । तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस ॥२७८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामरूपी मेघ ! चाहे तुम ठीक समयपर बरसो (कृपाकी दृष्टि करो) चाहे जन्मभर उदासीन रहो—कभी न बरसो, परंतु इस चित्तरूपी चातकको तो तुम्हारी ही आशा है ॥२७८॥ चातक तुलसीके मतें स्वातिहुँ पिएँ न पानि । प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि ॥२७९॥ भावार्थ—हे चातक ! तुलसीदासके मतसे तो तू स्वाति नक्षत्रमें बरसा हुआ जल भी न पीना ! क्योंकि प्रेमकी प्यासका बढ़ते रहना ही अच्छा है; घटनेसे तो प्रेमकी निष्ठा ही घट जायगी ॥२७९॥ रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग । तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग ॥२८०॥ भावार्थ—अपने प्यारे मेघका नाम रटते-रटते चातककी जीभ लट गयी और प्यासके मारे सब अङ्ग सूख गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि तो भी चातकके प्रेमका रंग तो नित्य नया और सुन्दर ही होता जाता है ॥२८०॥ चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष । तुलसी प्रेम पयोधि की ताते नाप न जोख ॥२८१॥
९६ दोहावली भावार्थ—चातकके चित्तमें अपने प्रियतम मेघका दोष कभी आता ही नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि इसीलिये प्रेमके अथाह समुद्रका कोई माप-तौल नहीं हो सकता (उसका थाह नहीं लगाया जा सकता) ॥२८१॥ बरषि परुष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक। तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक ॥२८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ (बादल) कठोर ओले बरसाकर भले ही चातककी पांखोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे, पर प्रेमके प्रणमें चतुर चातकको अपने प्रेमका प्रण निबाहनेमें कभी भूल नहीं करनी चाहिये ॥२८२॥ उपल बरषि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर। चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर ॥२८३॥ भावार्थ—मेघ कड़क-कड़ककर गर्जता हुआ ओले बरसाता है और कठोर बिजली भी गिरा देता है; इतनेपर भी प्रेमी पपीहा मेघको छोड़कर क्या कभी किसी दूसरी ओर ताकता है ? ॥२८३॥ पबि पाहन दामिनि गरज झरि झकोर खरि खीझि। रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि ॥२८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ बिजली गिराकर, ओले बरसाकर, बिजली चमकाकर, कड़क-कड़ककर, वर्षाकी झड़ी लगा- कर और आंधीके झकोरे देकर अपना बड़ा भारी रोष प्रकट करता है; परंतु चातकको अपने प्रियतमका दोष देखकर क्रोध नहीं होता (उसे दोष दीखता ही नहीं), बल्कि इसमें भी वह अपने प्रति मेघका अनुराग देखकर उसपर रीझ जाता है ॥२८४॥
दोहावली ९७ मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु । तुलसी तीनिउ तब फबैं जौ चातक मत लेहु ॥२८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि आत्मसम्मानकी रक्षा करना, माँगना और फिर भी प्रियतमसे प्रेमका नित्य नवीन होना (बढ़ना)—ये तीनों बातें तभी शोभा देती हैं जब चातकके मतका अनुसरण किया जाय ॥ २८५ ॥ तुलसी चातक ही फबै मान राखिबो प्रेम । बक्र बूंद लखि स्वातिहु निदरि निबाहत नेम ॥२८६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, प्रेमके मानकी रक्षा करना और प्रेमको भी निबाहना चातकहीको शोभा देता है। स्वाती नक्षत्र- में भी यदि बूंद [मेघकी ओर निहारते हुए उसके मुखमें सीधी न पड़कर] टेढ़ी पड़ती है तो वह उसका निरादर करके प्रेमके नियमको निबाहता है (चोंचको टेढ़ी करनेमें दूसरी ओर ताकना हो जायगा और इससे उसके प्रेममें व्यभिचार होगा, इसलिये वह प्यासा रह जाता है, परंतु मुँह टेढ़ा नहीं करता । दूसरी बात यह है कि वह टेढ़ी चोंच करके पीता है तो उसका मान घटता है, वह माँगता नहीं है, प्रेमी है; देना हो तो सीधे दो, नहीं तो न सही) ॥ २८६ ॥ तुलसी चातक माँगन्यो एक एक घन दानि । देत जो भू भाजन भरत लेत जो घूंटक पानि ॥२८७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक एक ही (अद्वितीय) माँगनेवाला है और बादल भी एक ही (अद्वितीय) दानी है। बादल इतना देता है कि पृथ्वीके सब बर्तन (झील, तालाब आदि) भर जाते हैं; परंतु चातक केवल एक घूंट ही पानी लेता है ॥२८७॥ दोहा० ७-८—
९८ दोहावली तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही केँ माथ । तुलसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ ॥२८८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तीनों लोकोंमें और तीनों कालोंमें कीर्ति तो केवल अनन्य प्रेमी चातकके ही भाग्यमें है, जिसकी दीनता संसारमें किसी भी दूसरे स्वामीने नहीं सुन पायी ॥ २८८ ॥ प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि । जाचक जगत कनाउड़ो कियो कनौड़ा दानि ॥२८९॥ भावार्थ—पपीहा और मेघके प्रेमका परिचय प्रत्यक्ष ही नये ही ढंगका है; याचक (मँगता) तो संसारभरका ऋणी होता है, परंतु इस प्रेमी पपीहेने दानी मेघको अपना ऋणी बना डाला ॥२८९॥ नहिं जाचत नहिं संग्रहइ सीस नाइ नहिं लेइ । ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिनु देइ ॥२९०॥ भावार्थ—पपीहा न तो मुंहसे मांगता है, न जलका संग्रह करता है और
लिये सुखदायिनी होती है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक- की-सी रीझ (प्रेम) और मेघकी-सी बुद्धि किसी विरले ही बुद्धिमान्की होती है (चातक मेघपर इतना रीझा रहता है कि कष्ट सहनेपर भी : उससे प्रेम बढ़ाता ही है और मेघकी ऐसी बुद्धिगुणज्ञता है कि वह दाता होकर भी ऋणी बन जाता है।) ॥ २६२ ॥ चातक जीवन दायकहि जीवन समयँ सुरीति । तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति ॥२९३॥ भावार्थ—चातकके जीवनदाता मेघके प्रेमकी सुन्दर रीति तो उसके जीवनकालमें ही देखनेमें आती है; परंतु [अनन्य प्रेमी] चातकका प्रेम एवं विश्वास तो अलख (अज्ञेय) है, तुलसीदासजी कहते हैं, वह तो किसीके लखनेमें ही नहीं आता (अर्थात् उसका प्रेम तो मरते समय भी बना रहता है)—(देखिये दो० ३०२, ३०४, ३०५) ॥ २६३ ॥ जीव चराचर जहाँ लगें हैं सब को हित मेह । तुलसी चातक मन बस्यो घन सौं सहज सनेह ॥२९४॥ भावार्थ—संसारमें जितने चर-अचर जीव हैं, मेघ उन सभीका हितकारी है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि उस मेघके प्रति स्वाभाविक स्नेह तो एक चातकके ही चित्तमें बसा हुआ है ॥२६४॥ डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरिन बारि । सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि ॥२९५॥ भावार्थ—वनमें बहुत-से पक्षी डोलते हैं और वे पोखरियोंका जल पिया करते हैं; परंतु हे नित्य नवीन प्रेमी चातक ! चौदहों लोकोंको अपने निर्मल यशसे उज्ज्वल तो एक तू ही करता है ॥२६५॥
१०० दोहावली मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर । सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भरि तोर ॥२६६॥ भावार्थ—कोयल, मोर और चकोर मुँहके तो मीठे होते हैं; परंतु मनके बड़े मैले होते हैं (बोली तो बड़ी मीठी बोलते हैं, पर कीट-सर्पादि जीवोंको खा जाते हैं) परंतु हे नवल चातक ! विश्व- भरमें निर्मल यश तो तेरा ही छाया हुआ है ॥ २६६ ॥ बास बेस बोलनि चलनि मानस मंजु मराल । तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल ॥२६७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हंसका निवासस्थान (मानसरोवर), वेष (रंग-रूप), बोली, चाल और [नीर-क्षीरका विवेक रखनेवाला तथा मोती चुगनेकी टेकवाला] मन सभी सुन्दर हैं, परंतु प्रेमकी कीर्ति तो सबसे बढ़कर विस्तृत और निर्मल चातक- की ही है ॥ २६७ ॥ प्रेम न परखिअ परुषपन पयद सिखावन एह । जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह ॥२६८॥ भावार्थ—संसारके लोग (विषयीजन) कहते हैं कि चातक पापी है, क्योंकि मेघ ऊसरतकमैं बरसता है [परंतु चातकके मुँहमें नहीं बरसता]; पर मेघ इससे यह शिक्षा देता है कि प्रेमकी परीक्षा कठोरतासे नहीं करनी चाहिये (अर्थात् कठोरतामें प्रेम नहीं है, ऐसा नहीं मानना चाहिये; कहीं-कहीं कठोरतामें ही प्रेमका प्रकाश होता है। चातक पापी नहीं है, महान् प्रेमी है; उसके प्रेमका यश मेघकी कठोरतासे बढ़ता है) ॥ २६८ ॥ होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़ । तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़ ॥२६९॥
दोहावली १०१ भावार्थ—न तो चातक ही पापी है और न जीवनदाता मेघ ही मूर्ख है। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रह्लादकी दशापर विचार करके समझो कि प्रेमका मार्ग कितना गूढ़ (सूक्ष्म) है। (प्रह्लादको पद-पद- पर कष्ट मिलता है और भगवान् उसके कष्टको जानते हुए भी बहुत विलम्बसे प्रकट होते हैं। यह उनकी प्रेमलीला ही है।) ॥२९९॥ गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि । तुलसी चातक चतुर सो जाचक जानि सुदानि ॥३००॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, कि अपनी-अपनी गरज सभी को होती है और उसी गरजको (कामनाको) हृदयमें रखकर लोग जहाँ-तहाँ गरज करते (सबसे विनती करते) फिरते हैं। परंतु चतुर (अनन्य प्रेमी) चातक तो एक मेघको ही सर्वोत्तम दानी समझकर केवल उसीका याचक बना ॥३००॥ चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर । तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर ॥३०१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बाजके पंजेमें फँसनेपर चातकको अपने प्रेमके नियमकी पीड़ा (चिन्ता) होती है। [उसे यह चिन्ता नहीं होती कि मैं मर जाऊँगा, पर इस बातकी बड़ी पीड़ा होती है कि बाजके द्वारा मारे जानेपर] मेरी हड्डियाँ और पाँख [स्वाती-नक्षत्रमें मेघ-जलमें न पड़कर] पृथ्वीके साधारण जलमें पड़ेगा ॥३०१॥ बध्यो बधिक परचो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच । तुलसी चातक प्रेम पट मरतहूँ लगी न खोंच ॥३०२॥ भावार्थ—किसी बहेलियेने चातकको मार दिया, वह पुण्य- सलिल गङ्गाजीमें गिर पड़ा; परंतु गिरते ही उस अनन्य प्रेमी
१०२ दोहावली चातकने चोंचको उलट कर ऊपर उठा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि चातकके प्रेमरूपी वस्त्रपर मरते दमतक कोई खोंच नहीं लगी (वह कहींसे फटा नहीं) ॥३०२॥ अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि। गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि ॥३०३॥ भावार्थ—किसी चातकने अंडेको फोड़कर उसमेंसे बच्चा निकाला, परंतु अंडेके छिलकेको पानीमें पड़ा हुआ देखकर उस [प्रेमराज्यके] चतुर चातकने, तुरंत उसे पंजेसे पकड़कर जलसे बाहर फेंक दिया ॥३०३॥ तुलसी चातक देत सिख सुतहि बारहीं बार। तात न तर्पण कीजिए बिना बारिधर धार ॥३०४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक अपने पुत्रको वारंबार यही सीख देता है कि हे तात! [मेरे मरने पर] प्यारे मेघ की धाराको छोड़कर अन्य किसी जलसे मेरा तर्पण न करना ॥३०४॥ सोरठा जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहिं। सुरसरिहू को बारि मरत न माँगेउ अरध जल ॥३०५॥ भावार्थ—जीते-जी तो चातकने [प्यारे] मेघको छोड़कर दूसरेके सामने गर्दन नहीं झुकायी (याचना नहीं की) और मरते समय भी गङ्गाजलमें* अर्धजलीतक न माँगी (मुक्तिका भी निरादर कर दिया) ॥३०५॥ *मरते हुए आदमीको आधा गङ्गाजीमें और आधा बाहर रखते हैं, इसको 'अर्धजल' क्रिया कहते हैं। इस अवस्थामें जिसके प्राण छूटते हैं, उसकी सहज मुक्ति हो जाती है—ऐसा शास्त्रोंमें वर्णन आता है।
दोहावली १०४ सुनु रे तुलसीदास प्यास पपीहहि प्रेम की । परिहरि चारिउ मास जो अँचवै जल स्वाति को ॥३०६॥ भावार्थ—रे तुलसीदास ! सुन, पपीहेको तो केवल प्रेमकी ही प्यास है [जलकी नहीं]; इसीलिये वह बरसातके चारों महीनोंके जलको छोड़कर केवल स्वाति-नक्षत्रका ही जल पीता है ॥३०६॥ जाँचै बारह मास पिएै पपीहा स्वाति जल । जान्यो तुलसीदास जोगवत नेही नेह मन ॥३०७॥ भावार्थ—चातक बारहों महीने मेघसे [उसे देखते ही ‘पिउ- पिउ’ की पुकार मचाकर] जल मांगा करता है, परंतु पीता है केवल स्वाति-नक्षत्रका ही जल । तुलसीदासजी कहते हैं कि मैंने इससे यह समझा है कि चातक ऐसा करके अपने स्नेही मेघका मन रखता है (जिससे मेघको यह कहनेका मौका न मिले कि तू तो स्वार्थी है, जब प्यास लगती है, तभी मुझे पुकारता है, फिर सालभर मेरा नाम भी नहीं लेता) ॥३०७॥ दोहा तुलसी कें मत चातकहि केवल प्रेम पिआस । पिअत स्वाति जल जान जग जाँचत बारह मास ॥३०८॥ भावार्थ—तुलसीदासके मतसे तो चातकको केवल प्रेमकी ही प्यास है [जलकी नहीं]; क्योंकि सारा जगत् इस बातको जानता है कि चातक पीता तो है केवल स्वाति-नक्षत्रका जल, परंतु याचक बना रहता है बारहों महीने ॥३०८॥ आलवाल मुकुताहलनि हिय सनेह तरु मूल । होइ हेतु चित चातकहि स्वाति सलिल अनुकूल ॥३०९॥ भावार्थ—चातकके हृदयरूपी मोतियोंकी (बहुमूल्य) क्यारीमें प्रेमरूपी वृक्षकी जड़ लगी है । ईश्वर करे स्वाति-नक्षत्रका जल
१०४ दोहावली चातकके चित्तमें रहनेवाले प्रेमके लिये अनुकूल हो जाय। (अर्थात् स्वाति-नक्षत्रके जलसे हृदयमें लगी हुई प्रेम वृक्षकी जड़ भलीभाँति सींची जाय, जिससे प्रेम-वृक्ष फूल-फलकर लहलहा उठे) ॥३०६॥ उष्ण काल अरु देह खिन मग पंथी तन ऊख । चातक बतियाँ ना रुचीं अन जल सींचें रूख ॥३१०॥ भावार्थ—गर्मियोंके दिन थे, चातक शरीरसे खिन्न था (थका हुआ था), रास्ते चल रहा था, उसका शरीर बहुत गरम हो रहा था [इतनेमें उसे कुछ पेड़ दीख पड़े, मनमें आया कि जरा विश्राम कर लूं] परंतु अनन्य प्रेमी चातकको मनकी यह बात अच्छी नहीं लगी; क्योंकि वे वृक्ष [स्वाति-नक्षत्रके जलसे सींचे हुए न होकर] दूसरे ही जलसे सींचे हुए थे ॥३१०॥ अन जल सींचे रूख की-छाया तें बरु घाम । तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम ॥३११॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यों चातक (चातक- प्रेमका दम भरनेवाले) बहुत हैं, परंतु ‘स्वातीके जलके अतिरिक्त अन्य जलसे सींचे हुए वृक्षकी छायासे तो धूप ही अच्छी' ऐसा मानना तो किसी [प्रेम-प्रणको निबाहनेमें] चतुर चातक (सच्चे प्रेमी) का ही काम है ॥३११॥ एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह । तुलसी जासों हित लगै वहि अहार वहि देह ॥३१२॥ भावार्थ—चातकका जो रात-दिनका (नित्य-चौबीसों घंटेका) प्रेम है, वही एकाङ्गी प्रेम है।* तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसा एकाङ्गी *एकाङ्गी प्रेम उसे कहते हैं, जिसमें प्रेमी यह नहीं देखता कि प्रेमास्पद उसके बदलेमें प्रेम करता है या नहीं।
दोहावली १०५
प्रेम जिसके साथ लग जाता है, वही उसका आहार है, (वह खाना- पीना सब भूलकर उसीकी स्मृतिसे जीता रहता है) और वही उसका शरीर है (वह अपने शरीरकी सुधि भुलाकर उसीके शरीरमें तन्मय हुआ रहता है) ॥ ३१२ ॥ एकांगी अनुरागके अन्य उदाहरण बिबि रसना तनु स्याम है बंक चलनि बिख खानि । तुलसी जस श्रवननि सुन्यो सीस समर्प्यो आनि ॥३१३॥ भावार्थ—जिसके दो जीभें हैं, काला शरीर और टेढ़ी चाल है तथा जो विषकी खान है, ऐसा सर्प भी कानोंसे अपनी प्रशंसा सुनते ही [प्रेमवश] आकर अपना सिर सौंप देता है* ॥ ३१३ ॥ मृगका उदाहरण आपु ब्याध को रूप धरि चहै कुरंगहि राग । तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग ॥३१४॥ भावार्थ—राग (वीणाका मधुर स्वर) स्वयं बहेलियाका रूप धरकर हरिनको मार डाले [परंतु रागके प्रति उसका अनुराग तो वैसा ही रहता है]। तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि राग
१०६ | दोहावली
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि [मणिके लोभसे सर्प- को मारनेके लिये आये हुए] व्याधको मणि अपने प्रकाशसे भले ही सर्प दिखला दे, [और इस प्रकार उसकी मृत्युमें सहायक बनकर शत्रु का काम करे] परंतु [इससे क्या मणिके प्रति सर्प- का अनुराग कम हो जाता है ? क्या मणिके वियोग में सर्प अन्धा नहीं हो जाता.?* (अर्थात् वह अन्धा हो जाता है) और मणिसे उसका प्रेम नहीं हटता ॥ ३१५ ॥
कमलका उदाहरण
जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ । उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ ॥३१६॥ भावार्थ—कमलोंके वनको पालेसे जलते हुए देखकर भी सूर्य उनकी ओर पीठ देकर (उनकी अवहेलना करके) चाहे भाग जाय, परंतु सूर्यके उदय होनेपर खिल जाना और अस्त होनेपर सिकुड़ जाना—कमलोंका यह सहज स्वभाव (स्वाभाविक प्रेम) नहीं मिट सकता ॥ ३१६ ॥
मछलीका उदाहरण
देउ आपने हाथ जल मीनहि माहुरु घोरि । तुलसी जिऐ जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि ॥३१७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जल चाहे स्वयं अपने
*कहा जाता है कि रातको मणिधर सर्प अपनी मणि निकालकर जमीनपर रख देता है और उसके प्रकाशसे ओस चाटा करता है और आहारकी खोज किया करता है। व्याध आकर उस मणिपर गोबर डाल देता है, जिससे मणिका प्रकाश ढक जाता है और सर्प मणिको न पाकर अंधा हो जाता है और सिर पटक-पटककर मर जाता है।
दोहावली १०७ हाथसे विष घोलकर मछलीको दे दे, पर यदि मछली बिना जलके (जलसे बाहर निकलनेपर) जीवित रह जाय तो तुम कवियोंको दोष दे सकते हो (यह कह सकते हो कि यह सब कवियोंकी झूठी कल्पना है)। तात्पर्य यह कि जलके द्वारा चाहे जैसी नीचता होनेपर भी एकाङ्गी प्रेमका पालन करनेवाली मछली जलके वियोगमें नहीं जी सकती ॥ ३१७ ॥ मकर उरग दादुर कमठ जल जीवन जल गेह । तुलसी एकै मीन को है साँचिलो सनेह ॥३१८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मगर, पानीके साँप, मेढक और कछुए आदि जलचर जीवोंका भी जल ही जीवन है और जल ही घर है, परंतु जलके साथ सच्चा प्रेम तो एक मछलीका ही है। (और सब जीव जलके बिना स्थलपर भी जीवित रह जाते हैं, परंतु मछली तो जलको वियोग होते ही प्राण त्याग कर देती है) ॥ ३१८ ॥ मयूरशिखा बूटीका उदाहरण तुलसी मिटै न मरि मिटेहुँ साँचो सहज सनेह । मोरसिखा बिनु मूरिहुँ पलुहत गरजत मेह ॥३१९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सच्चा और स्वाभाविक प्रेम मर मिटनेपर भी नहीं मिटता। बादलोंके गरजते ही [मेघके प्रति प्रेम करनेवाली सूखी हुई] मयूरशिखा बूटी बिना जड़की होने- पर भी [तुरंत] पनप उठती है ॥ ३१९ ॥ सुलभ प्रीति प्रीतम सबै कहत करत सब कोइ । तुलसी मीन पुनीत ते त्रिभुवन बड़ो न कोइ ॥३२०॥
१०८ दोहावली भावार्थ—सभी यह कहते हैं कि प्रेम और प्रियतम दोनों ही सुलभ (सस्ते) हैं और सब ऐसा करते भी हैं (किसीको प्रियतम बनाकर उससे प्रेम करते हैं), परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि [सच्चे प्रेमके नाते] मछलीसे बढ़कर पवित्र तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है (मछली जलसे निष्काम प्रेम करती है और वियोग होते ही प्राण त्याग देती है; दूसरे ऐसा नहीं करते) ॥३२०॥ अनन्यताकी महिमा तुलसी जप तप नेम व्रत सब सबहीं तें होइ । लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ ॥३२१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जप, तप, नेम तथा व्रत आदि सब साधन तो सभीसे बन सकते हैं, परंतु मनुष्य बड़ाई तब पाता है, जब वह देवता (भगवान) को अपना [एक मात्र] इष्टदेव- प्रेमका देवता बना लेता है ॥३२१॥ गाढ़े दिनका मित्र ही मित्र है कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होइ । ससि छबि हर रबि सदन तउ मित्र कहत सब कोइ ॥३२२॥ भावार्थ—सुखके दिनोंमें चाहे कोई मित्र या शत्रु कुछ भी क्यों न हो (कोई महत्वकी बात नहीं है) सच्चा मित्र तो वही है जो बुरे (विपत्तिके) दिनोंमें प्रेम करता है। सूर्य अपने घरमें (अमा- वस्याके* दिन) चन्द्रमाकी शोभाको हरण कर लेता है, फिर भी उसको सब 'मित्र' ही कहते हैं (क्योंकि वह विपत्तिमें चन्द्रमाका हित करता है, अपनी किरणोंसे सदा उसे प्रकाश देता रहता है*) ॥३२२॥ *अमावस्याके दिन सूर्य और चन्द्र एक साथ रहते हैं। 'मित्र' सूर्यका नाम भी है।
दोहावली १०६ बराबरीका स्नेह दुःखदायक होता है कै लघु कै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ । तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ ॥३२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मित्र अपनेसे या तो छोटा हो या बड़ा हो, तभी कल्याण है; बराबरीका प्रेम तो दुःखदायक ही होता है । जैसे घी और मधु बराबर परिमाणमें मिल जानेसे भयंकर विष हो जाता है ॥ ३२३ ॥ मित्रतामें छल बाधक है मान्य मीत सों सुख चहैं सो न छुए छल छाहँ । ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ ॥३२४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो कोई अपने सम्मान्य मित्रसे सुख चाहता हो तो उसे चाहिये कि वह चन्द्रमा¹, त्रिशंकु² और कैकेयी³की गतिको मनमें विचारकर छलकी छायाको भी न छुवै (अर्थात् किसी भी प्रकारसे छल न करे) ॥ ३२४ ॥ कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ । पलक पानि पर ओड़िअत समुझि कुघाइ सुघाइ ॥३२५॥ भावार्थ—सच्चा हितैषी उसीको कहना चाहिये, जो नरम १. चन्द्रमाने गुरुपत्नी-गमन किया, जिससे वह अबतक बदनाम है। चन्द्रको सभी कलङ्की कहते हैं। २. त्रिशंकुको गुरु वसिष्ठका अपमान करनेके कारण पहले चाण्डाल होना पड़ा और तत्पश्चात् विश्वामित्रजीके तपोबलसे सदेह स्वर्ग जाते हुए वापस उल्टे मुंह गिरना और अधः लटकना पड़ा। ३. कैकेयीने अपने स्वामी दशरथसे छल करके तुरंत ही वैधव्य और सदाके लिये अपयश अपने सिर ले लिया।
११० दोहावली (साधारण) या कठिन—कैसा भी काम पड़नेपर (हल्की या भारी विपत्तिके समय) स्वयं (बिना किसी अनुरोधके) हठ करके सहायता करे। जैसे आँखोंपर कोमल चोट होते हुए देखकर उसे पलकोंपर ओढ़ लिया (रोक लिया) जाता है और शरीरपर भारी चोट होते हुए देखकर उसे हाथोंपर ओढ़ लिया जाता है (आँखपर जरा-सा भी कोई आघात होनेको होता है तो पलकें तुरंत स्वाभाविक ही बंद होकर आँखोंको ढक लेती हैं और आघात स्वयं सह लेती हैं और सिरपर आघात लगनेकी आशंका होते ही हाथ स्वयमेव उसे बचानेके लिये ऊपर उठ जाते हैं और स्वयं चोट सह लेते हैं) ॥ ३२५ ॥ बैर और प्रेम अंधे होते हैं तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलोचन चारि । सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि ॥३२६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बैर और प्रेम दोनों चारों आँखोंसे (अन्तर्दृष्टि एवं बाह्यदृष्टि दोनोंसे रहित) अंधे होते हैं। बैरी अपने द्वेषीके गुणोंको नहीं देखता और प्रेमी अपने प्रेमास्पद दोष नहीं देखता), और न इनको उचित-अनुचितका ज्ञान होता है। जैसे सेवड़ा (वाममार्गी साधक) शराबका [अत्यन्त निन्दनीय और त्याज्य होनेपर भी] आदर करते हैं और पवित्र गंगाजलकी निन्दा करते हैं ॥ ३२६ ॥ दानी और याचकका स्वभाव रुचै मागनेहि मागिबो तुलसी दानिहि दानु । आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु ॥३२७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि भिखमंगेको माँगना और देनेवालेको दान देना ही अच्छा लगता है; अपने-अपने काममें
दोहावली १११ (मांगने और देनेमें) न तो दोनोंको आलस्य आता है, न उद्वेग अथवा झुंझलाहट ही होती है और न आश्चर्य ही होता है; क्योंकि प्रेमको ही इन सब भावोंका ढक्कन समझो (मांगनेवालेको मांगनेसे तथा देनेवालेको दानसे स्वाभाविक प्रेम हो जाता है, जिससे ये सब बातें उनमें नहीं आ पातीं) ॥३२७॥ प्रेम और बैर ही अनुकूलता और प्रतिकूलतामें हेतु हैं अमिअ गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार। प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर ॥३२८॥ भावार्थ—ब्रह्माजीने अमृत और विषको निचोड़कर (उनके साररूपमें) गालीको रचा है। इसीलिये गाली, प्रेम और वैर दोनों- की जननी (पैदा करनेवाली) है। इस बातको बुद्धिमान् पुरुष जानते हैं, गँवार नहीं (हँसी-मजाक या विवाहके समय दी जानेवाली गाली प्रेम उत्पन्न करती है और द्वेष, वैमनस्य या क्रोधसे दी हुई वैर पैदा करती है) ॥३२८॥ स्मरण और प्रिय भाषण ही प्रेमकी निशानी है सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहहिं प्रिय बैन। ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन ॥३२९॥ भावार्थ—जो न तो सदा (कभी) याद करते हैं और न कभी मिलनेपर मीठे वचन ही बोलते हैं; उनके घर वे ही जाते हैं जिनके हियेकी आँखें फूटी होती हैं (अर्थात् जो महान्-मूर्ख होते हैं) ॥३२९॥ स्वार्थ ही अच्छाई-बुराईका मानदण्ड है हित पुनीत सब स्वारथहि अरि असुद्ध बिनु चाड़। निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़ ॥३३०॥
११२ दोहावली भावार्थ—जबतक स्वार्थ है, तबतक सभी वस्तुएँ पवित्र और हितकारी जान पड़ती हैं, बिना चाहंकी वही चीजें (जो स्वार्थके समय पवित्र और हितकारी जान पड़ती थीं) अपवित्र और शत्रुके समान दिखायी देने लगती हैं। जैसे जबतक दाँत अपने मुंहमें रहते हैं, तबतक वे माणिक के समान मूल्यवान् होते हैं; परंतु वही टूटकर जब जमीनपर गिर पड़ते हैं, तब [अस्पृश्य] हाड़ कहलाते हैं ॥३३०॥ संसारमें प्रेममार्गके अधिकारी बिरले ही हैं माखी काक उलूक बक दादुर से भए लोग । भले ते सुक पिक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग ॥३३१॥ भावार्थ—संसारमें अधिकांश लोग तो मक्खी, कौए, उल्लू, बगुले और मेढकके सदृश (बिना ही कारण हानि करनेवाले, पर- निन्दारूपी मल भक्षण करनेवाले, भगवान्की ओरसे आँख मूंदे रखने वाले, ऊपरसे सुन्दर वेश धारणकर अंदरसे छलनेकी इच्छा रखनेवाले और व्यर्थका बकवाद करनेवाले) हो गये हैं और जो कुछ भले लोग हैं, वे भी तोते, कोयल और मोरके सदृश (देखनेमें अच्छे, पर पलमें प्रेम तोड़कर भाग जानेवाले, बोलनेमें मधुर परंतु स्वार्थी, शरीरसे सुन्दर परंतु कठोर हृदय) हैं, प्रेमपथपर चलने योग्य तो कोई भी नहीं है ॥३३१॥) कलियुगमें कपटकी प्रधानता हृदयँ कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि । अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि ॥३३२॥ भावार्थ—आजकलके लोग तो मोरके समान हैं; वे सुन्दर वेश धारण करते हैं (ऊपरसे बहुत ही अच्छा, शिष्टतापूर्ण व्यवहार