भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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११२ दोहावली भावार्थ—जबतक स्वार्थ है, तबतक सभी वस्तुएँ पवित्र और हितकारी जान पड़ती हैं, बिना चाहंकी वही चीजें (जो स्वार्थके समय पवित्र और हितकारी जान पड़ती थीं) अपवित्र और शत्रुके समान दिखायी देने लगती हैं। जैसे जबतक दाँत अपने मुंहमें रहते हैं, तबतक वे माणिक के समान मूल्यवान् होते हैं; परंतु वही टूटकर जब जमीनपर गिर पड़ते हैं, तब [अस्पृश्य] हाड़ कहलाते हैं ॥३३०॥ संसारमें प्रेममार्गके अधिकारी बिरले ही हैं माखी काक उलूक बक दादुर से भए लोग । भले ते सुक पिक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग ॥३३१॥ भावार्थ—संसारमें अधिकांश लोग तो मक्खी, कौए, उल्लू, बगुले और मेढकके सदृश (बिना ही कारण हानि करनेवाले, पर- निन्दारूपी मल भक्षण करनेवाले, भगवान्‌की ओरसे आँख मूंदे रखने वाले, ऊपरसे सुन्दर वेश धारणकर अंदरसे छलनेकी इच्छा रखनेवाले और व्यर्थका बकवाद करनेवाले) हो गये हैं और जो कुछ भले लोग हैं, वे भी तोते, कोयल और मोरके सदृश (देखनेमें अच्छे, पर पलमें प्रेम तोड़कर भाग जानेवाले, बोलनेमें मधुर परंतु स्वार्थी, शरीरसे सुन्दर परंतु कठोर हृदय) हैं, प्रेमपथपर चलने योग्य तो कोई भी नहीं है ॥३३१॥) कलियुगमें कपटकी प्रधानता हृदयँ कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि । अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि ॥३३२॥ भावार्थ—आजकलके लोग तो मोरके समान हैं; वे सुन्दर वेश धारण करते हैं (ऊपरसे बहुत ही अच्छा, शिष्टतापूर्ण व्यवहार