दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १११ (मांगने और देनेमें) न तो दोनोंको आलस्य आता है, न उद्वेग अथवा झुंझलाहट ही होती है और न आश्चर्य ही होता है; क्योंकि प्रेमको ही इन सब भावोंका ढक्कन समझो (मांगनेवालेको मांगनेसे तथा देनेवालेको दानसे स्वाभाविक प्रेम हो जाता है, जिससे ये सब बातें उनमें नहीं आ पातीं) ॥३२७॥ प्रेम और बैर ही अनुकूलता और प्रतिकूलतामें हेतु हैं अमिअ गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार। प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर ॥३२८॥ भावार्थ—ब्रह्माजीने अमृत और विषको निचोड़कर (उनके साररूपमें) गालीको रचा है। इसीलिये गाली, प्रेम और वैर दोनों- की जननी (पैदा करनेवाली) है। इस बातको बुद्धिमान् पुरुष जानते हैं, गँवार नहीं (हँसी-मजाक या विवाहके समय दी जानेवाली गाली प्रेम उत्पन्न करती है और द्वेष, वैमनस्य या क्रोधसे दी हुई वैर पैदा करती है) ॥३२८॥ स्मरण और प्रिय भाषण ही प्रेमकी निशानी है सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहहिं प्रिय बैन। ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन ॥३२९॥ भावार्थ—जो न तो सदा (कभी) याद करते हैं और न कभी मिलनेपर मीठे वचन ही बोलते हैं; उनके घर वे ही जाते हैं जिनके हियेकी आँखें फूटी होती हैं (अर्थात् जो महान्-मूर्ख होते हैं) ॥३२९॥ स्वार्थ ही अच्छाई-बुराईका मानदण्ड है हित पुनीत सब स्वारथहि अरि असुद्ध बिनु चाड़। निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़ ॥३३०॥