भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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११० दोहावली (साधारण) या कठिन—कैसा भी काम पड़नेपर (हल्की या भारी विपत्तिके समय) स्वयं (बिना किसी अनुरोधके) हठ करके सहायता करे। जैसे आँखोंपर कोमल चोट होते हुए देखकर उसे पलकोंपर ओढ़ लिया (रोक लिया) जाता है और शरीरपर भारी चोट होते हुए देखकर उसे हाथोंपर ओढ़ लिया जाता है (आँखपर जरा-सा भी कोई आघात होनेको होता है तो पलकें तुरंत स्वाभाविक ही बंद होकर आँखोंको ढक लेती हैं और आघात स्वयं सह लेती हैं और सिरपर आघात लगनेकी आशंका होते ही हाथ स्वयमेव उसे बचानेके लिये ऊपर उठ जाते हैं और स्वयं चोट सह लेते हैं) ॥ ३२५ ॥ बैर और प्रेम अंधे होते हैं तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलोचन चारि । सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि ॥३२६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बैर और प्रेम दोनों चारों आँखोंसे (अन्तर्दृष्टि एवं बाह्यदृष्टि दोनोंसे रहित) अंधे होते हैं। बैरी अपने द्वेषीके गुणोंको नहीं देखता और प्रेमी अपने प्रेमास्पद दोष नहीं देखता), और न इनको उचित-अनुचितका ज्ञान होता है। जैसे सेवड़ा (वाममार्गी साधक) शराबका [अत्यन्त निन्दनीय और त्याज्य होनेपर भी] आदर करते हैं और पवित्र गंगाजलकी निन्दा करते हैं ॥ ३२६ ॥ दानी और याचकका स्वभाव रुचै मागनेहि मागिबो तुलसी दानिहि दानु । आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु ॥३२७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि भिखमंगेको माँगना और देनेवालेको दान देना ही अच्छा लगता है; अपने-अपने काममें