दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १०६ बराबरीका स्नेह दुःखदायक होता है कै लघु कै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ । तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ ॥३२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मित्र अपनेसे या तो छोटा हो या बड़ा हो, तभी कल्याण है; बराबरीका प्रेम तो दुःखदायक ही होता है । जैसे घी और मधु बराबर परिमाणमें मिल जानेसे भयंकर विष हो जाता है ॥ ३२३ ॥ मित्रतामें छल बाधक है मान्य मीत सों सुख चहैं सो न छुए छल छाहँ । ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ ॥३२४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो कोई अपने सम्मान्य मित्रसे सुख चाहता हो तो उसे चाहिये कि वह चन्द्रमा¹, त्रिशंकु² और कैकेयी³की गतिको मनमें विचारकर छलकी छायाको भी न छुवै (अर्थात् किसी भी प्रकारसे छल न करे) ॥ ३२४ ॥ कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ । पलक पानि पर ओड़िअत समुझि कुघाइ सुघाइ ॥३२५॥ भावार्थ—सच्चा हितैषी उसीको कहना चाहिये, जो नरम १. चन्द्रमाने गुरुपत्नी-गमन किया, जिससे वह अबतक बदनाम है। चन्द्रको सभी कलङ्की कहते हैं। २. त्रिशंकुको गुरु वसिष्ठका अपमान करनेके कारण पहले चाण्डाल होना पड़ा और तत्पश्चात् विश्वामित्रजीके तपोबलसे सदेह स्वर्ग जाते हुए वापस उल्टे मुंह गिरना और अधः लटकना पड़ा। ३. कैकेयीने अपने स्वामी दशरथसे छल करके तुरंत ही वैधव्य और सदाके लिये अपयश अपने सिर ले लिया।