दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
दोहावली १०६ बराबरीका स्नेह दुःखदायक होता है कै लघु कै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ । तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ ॥३२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मित्र अपनेसे या तो छोटा हो या बड़ा हो, तभी कल्याण है; बराबरीका प्रेम तो दुःखदायक ही होता है । जैसे घी और मधु बराबर परिमाणमें मिल जानेसे भयंकर विष हो जाता है ॥ ३२३ ॥ मित्रतामें छल बाधक है मान्य मीत सों सुख चहैं सो न छुए छल छाहँ । ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ ॥३२४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो कोई अपने सम्मान्य मित्रसे सुख चाहता हो तो उसे चाहिये कि वह चन्द्रमा¹, त्रिशंकु² और कैकेयी³की गतिको मनमें विचारकर छलकी छायाको भी न छुवै (अर्थात् किसी भी प्रकारसे छल न करे) ॥ ३२४ ॥ कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ । पलक पानि पर ओड़िअत समुझि कुघाइ सुघाइ ॥३२५॥ भावार्थ—सच्चा हितैषी उसीको कहना चाहिये, जो नरम १. चन्द्रमाने गुरुपत्नी-गमन किया, जिससे वह अबतक बदनाम है। चन्द्रको सभी कलङ्की कहते हैं। २. त्रिशंकुको गुरु वसिष्ठका अपमान करनेके कारण पहले चाण्डाल होना पड़ा और तत्पश्चात् विश्वामित्रजीके तपोबलसे सदेह स्वर्ग जाते हुए वापस उल्टे मुंह गिरना और अधः लटकना पड़ा। ३. कैकेयीने अपने स्वामी दशरथसे छल करके तुरंत ही वैधव्य और सदाके लिये अपयश अपने सिर ले लिया।
११० दोहावली (साधारण) या कठिन—कैसा भी काम पड़नेपर (हल्की या भारी विपत्तिके समय) स्वयं (बिना किसी अनुरोधके) हठ करके सहायता करे। जैसे आँखोंपर कोमल चोट होते हुए देखकर उसे पलकोंपर ओढ़ लिया (रोक लिया) जाता है और शरीरपर भारी चोट होते हुए देखकर उसे हाथोंपर ओढ़ लिया जाता है (आँखपर जरा-सा भी कोई आघात होनेको होता है तो पलकें तुरंत स्वाभाविक ही बंद होकर आँखोंको ढक लेती हैं और आघात स्वयं सह लेती हैं और सिरपर आघात लगनेकी आशंका होते ही हाथ स्वयमेव उसे बचानेके लिये ऊपर उठ जाते हैं और स्वयं चोट सह लेते हैं) ॥ ३२५ ॥ बैर और प्रेम अंधे होते हैं तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलोचन चारि । सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि ॥३२६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बैर और प्रेम दोनों चारों आँखोंसे (अन्तर्दृष्टि एवं बाह्यदृष्टि दोनोंसे रहित) अंधे होते हैं। बैरी अपने द्वेषीके गुणोंको नहीं देखता और प्रेमी अपने प्रेमास्पद दोष नहीं देखता), और न इनको उचित-अनुचितका ज्ञान होता है। जैसे सेवड़ा (वाममार्गी साधक) शराबका [अत्यन्त निन्दनीय और त्याज्य होनेपर भी] आदर करते हैं और पवित्र गंगाजलकी निन्दा करते हैं ॥ ३२६ ॥ दानी और याचकका स्वभाव रुचै मागनेहि मागिबो तुलसी दानिहि दानु । आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु ॥३२७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि भिखमंगेको माँगना और देनेवालेको दान देना ही अच्छा लगता है; अपने-अपने काममें
दोहावली १११ (मांगने और देनेमें) न तो दोनोंको आलस्य आता है, न उद्वेग अथवा झुंझलाहट ही होती है और न आश्चर्य ही होता है; क्योंकि प्रेमको ही इन सब भावोंका ढक्कन समझो (मांगनेवालेको मांगनेसे तथा देनेवालेको दानसे स्वाभाविक प्रेम हो जाता है, जिससे ये सब बातें उनमें नहीं आ पातीं) ॥३२७॥ प्रेम और बैर ही अनुकूलता और प्रतिकूलतामें हेतु हैं अमिअ गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार। प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर ॥३२८॥ भावार्थ—ब्रह्माजीने अमृत और विषको निचोड़कर (उनके साररूपमें) गालीको रचा है। इसीलिये गाली, प्रेम और वैर दोनों- की जननी (पैदा करनेवाली) है। इस बातको बुद्धिमान् पुरुष जानते हैं, गँवार नहीं (हँसी-मजाक या विवाहके समय दी जानेवाली गाली प्रेम उत्पन्न करती है और द्वेष, वैमनस्य या क्रोधसे दी हुई वैर पैदा करती है) ॥३२८॥ स्मरण और प्रिय भाषण ही प्रेमकी निशानी है सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहहिं प्रिय बैन। ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन ॥३२९॥ भावार्थ—जो न तो सदा (कभी) याद करते हैं और न कभी मिलनेपर मीठे वचन ही बोलते हैं; उनके घर वे ही जाते हैं जिनके हियेकी आँखें फूटी होती हैं (अर्थात् जो महान्-मूर्ख होते हैं) ॥३२९॥ स्वार्थ ही अच्छाई-बुराईका मानदण्ड है हित पुनीत सब स्वारथहि अरि असुद्ध बिनु चाड़। निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़ ॥३३०॥
११२ दोहावली भावार्थ—जबतक स्वार्थ है, तबतक सभी वस्तुएँ पवित्र और हितकारी जान पड़ती हैं, बिना चाहंकी वही चीजें (जो स्वार्थके समय पवित्र और हितकारी जान पड़ती थीं) अपवित्र और शत्रुके समान दिखायी देने लगती हैं। जैसे जबतक दाँत अपने मुंहमें रहते हैं, तबतक वे माणिक के समान मूल्यवान् होते हैं; परंतु वही टूटकर जब जमीनपर गिर पड़ते हैं, तब [अस्पृश्य] हाड़ कहलाते हैं ॥३३०॥ संसारमें प्रेममार्गके अधिकारी बिरले ही हैं माखी काक उलूक बक दादुर से भए लोग । भले ते सुक पिक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग ॥३३१॥ भावार्थ—संसारमें अधिकांश लोग तो मक्खी, कौए, उल्लू, बगुले और मेढकके सदृश (बिना ही कारण हानि करनेवाले, पर- निन्दारूपी मल भक्षण करनेवाले, भगवान्की ओरसे आँख मूंदे रखने वाले, ऊपरसे सुन्दर वेश धारणकर अंदरसे छलनेकी इच्छा रखनेवाले और व्यर्थका बकवाद करनेवाले) हो गये हैं और जो कुछ भले लोग हैं, वे भी तोते, कोयल और मोरके सदृश (देखनेमें अच्छे, पर पलमें प्रेम तोड़कर भाग जानेवाले, बोलनेमें मधुर परंतु स्वार्थी, शरीरसे सुन्दर परंतु कठोर हृदय) हैं, प्रेमपथपर चलने योग्य तो कोई भी नहीं है ॥३३१॥) कलियुगमें कपटकी प्रधानता हृदयँ कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि । अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि ॥३३२॥ भावार्थ—आजकलके लोग तो मोरके समान हैं; वे सुन्दर वेश धारण करते हैं (ऊपरसे बहुत ही अच्छा, शिष्टतापूर्ण व्यवहार
दोहावली ११३ करते हैं) और अच्छी तरह बना-बनाकर बातें करते हैं, परंतु उनके हृदयमें कपट भरा रहता है। ऐसे लोगोंसे दिल खोलकर कैसे मिला जाय ! (तात्पर्य यह है कि आजकल लोग ऊपरसे चिकनी-चुपड़ी बातें बनाना और देखनेमें सभ्यताका व्यवहार करना तो सीख गये हैं, परंतु उनके हृदयमें सरल प्रेम नहीं है; वे उस मयूरके समान हैं, जिसका शरीर बड़ा ही मनोहर और वाणी अत्यन्त मधुर होती है; परंतु जो हृदयका इतना कठोर होता है कि बड़े-बड़े जहरीले साँपों- को निगल जाता है) ॥३३२॥ कपट अन्ततक नहीं निभता चरन चोंच लोचन रँगौ चलौ मराली चाल । छीर नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल ॥३३३॥ भावार्थ—बगुला चाहे अपने चरण, चोंच और आँखोंको हंसकी तरह रँग ले और हंसकी-सी चाल भी चलने लगे; परंतु जिस समय दूध और जलको अलग-अलग करनेका अवसर आता है, उस समय उसकी पोल खुल जाती है ॥३३३॥ कुटिल मनुष्य अपनी कुटिलताको नहीं छोड़ सकता मिलै जो सरलहि सरल ह्वै कुटिल न सहज बिहाइ । सो सहेतु ज्यों बक्र गति ब्याल न बिलहिं समाइ ॥३३४॥ भावार्थ—कुटिल मनुष्य अपने स्वभावको नहीं छोड़ सकता । यदि वह किसी सरलहृदय पुरुषसे सरल होकर मिलता भी है तो समझ लेना चाहिये कि उसके ऐसा करनेमें कोई-न-कोई हेतु अवश्य है। जैसे साँप टेढ़ी चालसे बिलमें नहीं घुस सकता [इसलिये बिलमें घुसनेके लिये वह उस समय टेढ़ी चाल छोड़कर सीधा हो
११४ दोहावली जाता है, परंतु वास्तवमें उसकी स्वाभाविक टेढ़ी चाल नहीं मिटती] ॥३३४॥ कृसधन सखहि न देब दुख मुएहुँ न मागब नीच। तुलसी सज्जन की रहनि पावक पानी बीच ॥३३५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सज्जनोंकी स्थिति ऐसी हो जाती है जैसे आग और पानीके बीचमें रहना। वे थोड़ी पूँजीवाले मित्रसे तो धन माँगकर उसे कष्ट नहीं देंगे (ऐसा करनेमें उन्हें अग्निमें जलनेके समान पीड़ा होती है) और धनवान् नीच मनुष्यसे वे मरनेपर भी (अत्यन्त विपत्तिमें भी) नहीं माँगेंगे (क्योंकि उससे माँगना उन्हें जलमें डूब जानेके समान प्राणघातक प्रतीत होता है। अतः वे अभावका कष्ट ही सहते रहते हैं) ॥३३५॥ संग सरल कुटिलहि भएँ हरि हर करहिं निबाहु। ग्रह गनती गनि चतुर बिधि कियो उदर बिनु राहु ॥३३६॥ भावार्थ—सरल (सज्जन) और कुटिल (दुष्ट) का साथ हो जानेपर भगवान् विष्णु और शिव ही निर्वाह (रक्षा) करते हैं। राहुके ग्रहोंकी गणनामें गिने जानेपर चतुर ब्रह्माने उसको बिना पेटका बना दिया (यदि वह पेटहीन न होता तो उसका तथा अन्य ग्रहका सङ्ग निभता ही नहीं; क्योंकि वह दुष्ट ग्रह होनेके कारण साथी सरल ग्रहोंको कभी खा डाले होता) ॥३३६॥ स्वभावकी प्रधानता नीच निचाई नहिं तजइ सज्जनहू कें संग। तुलसी चंदन बिटप बसि बिनु बिष भए न भुअंग ॥३३७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सज्जनका सङ्ग होनेपर भी
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नीच मनुष्य अपनी नीचताको नहीं छोड़ता। चन्दनके वृक्षोंमें निवास करके भी साँप विषरहित नहीं हुए ॥३३७॥ भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु । सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ॥३३८॥ भावार्थ—भला आदमी अपनी भलाईसे और नीच अपनी नीचता- से ही शोभा पाता है। अमृतकी प्रशंसा इसलिये की जाती है कि वह अमरत्व प्रदान करता है, और विष वही सराहनीय है जिससे [शीघ्र और सहज ही] मृत्यु हो जाय ॥३३८॥ मिथ्या माहुर सज्जनहि खलहि गरल सम साँच । तुलसी छुवत पराइ ज्यों पारद पावक आँच ॥३३९॥ भावार्थ—सज्जन पुरुषके लिये असत्य विष है और दुष्टके लिये सत्य विषके समान है। सज्जन असत्यको और दुष्ट सत्यको छूते ही वैसे ही भाग जाते हैं जैसे अग्निकी आँच लगते ही पारा उड़ जाता है ॥३३९॥ सत्संग और असत्संगका परिणामगत भेद संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ । कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥३४०॥ भावार्थ—संतोंका सङ्गमोक्ष (भवबन्धनसे छूटने) का और विषयी पुरुषोंका सङ्ग संसारबन्धनमें पड़नेका मार्ग है। इस बातको संत कवि ज्ञानी और वेद-पुराणादि सद्ग्रन्थ सभी कहते हैं ॥३४०॥ सुकृत न सुकृती परिहरइ कपट न कपटी नीच । मरत सिखावन देइ चले गीधराज मारीच ॥३४१॥ भावार्थ—पुण्यात्मा पुरुष अपने पुण्यको और नीच, कपटी मनुष्य अपने कपटको मरते दमतक नहीं छोड़ते। जटायु और मारीच मरते-
११६ दोहावली मरते इसी बातकी सीख दे गये हैं (जटायुने सीताके छुड़ानेके प्रयत्न- में परोपकारार्थ प्राण छोड़े और मारीचने मरते समय भी रामके-से स्वरमें 'हा लक्ष्मण' कहकर सीताजीको धोखा दिया) ॥३४१॥ सज्जन और दुर्जनका भेद सुजन सुतरु बन ऊख सम खल टाँकिफा रुखान । पर हित अनहित लागि सब साँसति सहत समान ॥३४२॥ भावार्थ—सज्जन पुरुष सुन्दर (लाभकारी) कपास और ऊखके पौधेके समान हैं और दुर्जन टाँकी और रुखानीके* समान । सज्जन और दुर्जन दोनों ही समान रूपसे कष्ट सहते हैं; परंतु सज्जन सहते हैं पराये हितके लिये और दुष्ट दूसरोंके अहितके लिये ॥३४२॥ पिअहिं सुमन रस अलि बिटप काटि कोल फल खात । तुलसी तरुजीवी जुगल सुमति कुमति की बात ॥३४३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि [भ्रमर और भील दोनों ही वृक्षोंके सहारे जीते हैं, किंतु] भ्रमर फूलोंका रस ही पीते हैं (फूलोंको भी नहीं चुनते) और कोल-भील वृक्षको काटकर उसका फल खाते हैं। यह सुबुद्धि और कुबुद्धिकी बात है ॥३४३॥ अवसरकी प्रधानता अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिएँ का लाख । दुइज न चंदा देखिएँ उदौ कहा भरि पाख ॥३४४॥ भावार्थ—आवश्यकताके समय मनुष्य यदि कौड़ी देनेमें भी चूक जाय तो फिर [अनावश्यक बिना मौके] लाख रुपया देनेसे भी क्या होता है ? द्वितीयाके चन्द्रमाको न देखा जाय तो फिर पक्षभर चन्द्रमा उदय होता रहे, उससे क्या होगा ? ॥३४४॥ *बढ़इयोंका लोहेका एक औजार।
दोहावली ११७ भलाई करना बिरले ही जानते हैं ग्यान अनभले को सबहि भले भलेहू काउ । सींग सूँड़ रद लूम नख करत जीव जड़ घाउ ॥३४५॥ भावार्थ—बुराई करनेका ज्ञान तो सभीको है, परंतु भलाईका ज्ञान तो कभी किसी भलेको ही होता है। मूर्ख जानवर (गैंडा, हाथी, सिंह, चँवरी गाय, बंदर आदि) अपने सींग, सूँड़, दाँत, पूँछ तथा नख इत्यादिसे दूसरोंको चोट ही पहुँचाते हैं [उनसे भलाई करना नहीं जानते ]॥ ३४५ ॥ संसारमें हित करने वाले कम हैं तुलसी जग जीवन अहित कतहूँ कोउ हित जानि । सोषक भानु कृसानु महि पवन एक घन दानि ॥३४६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जगत्में जीवोंका अहित करनेवाले बहुत हैं, हित करनेवाला तो कहीं कोई एकाध ही जानो । सूर्य, अग्नि, पृथ्वी, पवन सभी जलको सुखानेवाले हैं, देनेवाला तो एक बादल ही है॥ ३४६ ॥ सुनिअ सुधा देखअहिं गरल सब करतूति कराल । जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥३४७॥ भावार्थ—अमृत तो केवल सुननेमें ही आता है; परंतु विष जहाँ-तहाँ प्रत्यक्ष देखे जाते हैं । विधाताके सभी काय विकराल हैं । कौए, उल्लू और बगुले जहाँ-तहाँ (सर्वत्र) दिखायी देते हैं, परंतु हंस तो केवल एक मानसरोवरमें ही मिलते हैं [दूसरोंकी बुराई करने- वाले नीच सभी जगह मिलते हैं, परंतु परहितमें लगे हुए संत तो सत्सङ्गमें ही मिलते हैं] ॥३४७॥
११८ दोहावली जलचर थलचर गगनचर देव दनुज नर नाग । उत्तम मध्यम अधम खल दस गुन बढ़त बिभाग ॥३४८॥ भावार्थ—जलमें रहनेवाले, स्थलपर रहनेवाले और आकाशमें विचरनेवाले जीवों तथा देवता, राक्षस, मनुष्य और नाग—इन सब योनियोंमें उत्तमकी अपेक्षा मध्यम, मध्यकी अपेक्षा अधम और अधमकी अपेक्षा नीच—दुष्ट प्राणियोंकी संख्या दसगुनी अधिक हो जाती है (उत्तमसे मध्यम दसगुने, मध्यमसे अधम दसगुने और अधमसे नीच दसगुने हैं, उत्तम बहुत ही थोड़े हैं) ॥ ३४८ ॥ बलि मिस देखे देवता कर मिस मानव देव । मुए मार सुबिचार हत स्वारथ साधन एव ॥३४९॥ भावार्थ—बलिदानके बहाने देवताओंको और राज्य-कर (दण्ड) के बहाने राजाओंको देख लिया। दोनों ही स्वार्थ साधनेवाले विचारशून्य और मरेको ही मारनेवाले हैं ॥ ३४९ ॥ सुजन कहत भल पोच पथ पापि न परखइ भेद । करमनास सुरसरित मिस बिधि निषेध बद बेद ॥३५०॥ भावार्थ—कर्मनाशा और गङ्गाजीके बहाने जैसे वेद विधि और निषेध दोनों तरहके कर्मोंका वर्णन करते हैं (कर्मनाशामें नहानेका निषेध है और गङ्गास्नानकी विधि है) वैसे ही सत्पुरुष [ग्रहण और त्यागके लिये] भले-बुरे दोनों ही मार्ग बतलाते हैं, परंतु पापी मनुष्य इस भेदको नहीं समझते ॥ ३५० ॥ वस्तु ही प्रधान है, आधार नहीं मनि भाजन मधु पारई पूरन अमी निहारि । का छांड़िअ का संग्रहिअ कहहु बिबेक बिचारि ॥३५१॥
दोहावली १११ भावार्थ—शराबसे भरे हुए मणिमय पात्र और अमृतसे पूर्ण मिट्टी- के बर्तनको देखकर जरा विवेकपूर्वक विचारकर कहो कि इन दोनोंमें किसका त्याग करना चाहिये और किसका ग्रहण ? (तात्पर्य यह कि उत्तम वस्तु सामान्य स्थानमें हो तो भी उसे लेना चाहिये, परंतु बुरी वस्तु उत्तम स्थानमें हो तो भी उसका त्याग ही करना चाहिये)॥३५१॥ प्रीति और वैर की तीन श्रेणियाँ उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि । प्रीति परिच्छा तिहुन की बैर बितिक्रम जानि ॥३५२॥ भावार्थ—प्रीतिकी परीक्षामें उत्तम, मध्यम और नीच—इन तीनोंकी स्थिति क्रमशः पत्थर, बालू और जलके समान है (अर्थात् उत्तम पुरुषकी प्रीति पत्थरकी लीकके समान अमिट है, मध्यम मनुष्य- की प्रीति बालूकी रेखाके समान—दूसरी हवा न लगनेतक ही है और नीचकी प्रीति तो जलकी लकीरके समान है। जैसे अँगुलीसे जलमें लकीर करते जाइये, साथ-ही-साथ वह मिटती चली जायगी, ऐसे ही नीचकी प्रीति तत्काल नष्ट हो जाती है); परंतु वैर इसके विपरीत (उत्तम पुरुषका जलकी लकीरके समान तत्काल नष्ट होनेवाला, मध्यमका बालूकी रेखाके समान कुछ समयतक रहनेवाला और नीच- का पत्थरकी लकीरके सदृश चिरस्थायी होता है) ॥ ३५२ ॥ जिसे सज्जन ग्रहण करते हैं उसे दुर्जन त्याग देते हैं पुन्य प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पांच । लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखावन साँच ॥३५३॥ भावार्थ—पुण्य, प्रेम, प्रतिष्ठा, प्राप्ति (लौकिक लाभ) और परमार्थका पथ—इन पाँचोंका सज्जनगण तो ग्रहण करते हैं और दुष्टलोग त्याग देते हैं। इस सच्ची सीखको सुनो ॥ ३५३ ॥
१२० दोहावली प्रकृतिके अनुसार व्यवहारका भेद भी आवश्यक है नीच निरादरहीं सुखद आदर सुखद बिसाल । कदरी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल ॥३५४॥ भावार्थ—नीच लोग निरादर करनेसे और बड़े लोग आदर करने- से सुखदायी होते हैं। इस बातको समझनेके लिये केले और बेर तथा कटहल और आमके पेड़ोंकी दशा देखो (केला तथा बेर काटे जाने- पर अधिक फल देते हैं, परंतु कटहल और आम सींचने और सेवा करने पर ही फलते हैं) ॥ ३५४ ॥ अपना आचरण सभीको अच्छा लगता है तुलसी अपनो आचरन भलो न लागत कासु । तेहि न बसात जो खात नित लहसुनहू को बासु ॥३५५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अपना आचरण किसको अच्छा नहीं लगता ? जो नित्य लहसुन खाता है, उसको लहसुनकी दुर्गन्ध नहीं मालूम होती ॥ ३५५ ॥ भाग्यवान् कौन है ? बुध सो बिबेकी बिमलमति जिन्ह कें रोष न राग । सुहृद सराहत साधु जेहि तुलसी ताको भाग ॥३५६॥ भावार्थ—वे पुरुष निर्मल बुद्धिवाले, ज्ञानवान् और बुद्धिमान् हैं जिनका न किसीमें राग (आसक्ति) है, न किसीके प्रति क्रोध (द्वेष) है; किंतु साधुजन जिन्हें सुहृद् (सबका अकारण हितू) कहकर सराहना करते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं वे बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ३५६ ॥
दोहावली १२१ साधुजन किसकी सराहना करते हैं आपु आपु कहँ सब भलो अपने कहँ कोइ कोइ। तुलसी सब कहँ जो भलो सुजन सराहिअ सोइ ॥३५७॥ भावार्थ—स्वयं अपने लिये सभी भले हैं (सभी अपनी भलाई करना चाहते हैं), कोई-कोई अपनोंकी (मित्र-बान्धवोंकी) भी भलाई करनेवाले होते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि जो सबकी भलाई करनेवाला (सुहृद्) है, साधुजनोंके द्वारा उसीकी सराहना होती है॥ ३५७॥ संगकी महिमा तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ । नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ ॥३५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अच्छी सङ्गतिसे मनुष्य अच्छा और बुरी सङ्गतिसे वही बुरा हो जाता है। हे लोगो! देखो— जो लोहा नावमें लगनेसे सबको पार उतारनेवाला और सितारमें लगनेसे मधुर संगीत सुनाकर सुख देनेवाला बन जाता है वही तलवार और तीरमें लगनेसे जीवोंका प्राणघातक हो जाता है॥ ३५८॥ गुरु संगति गुरु होइ सो लघु संगति लघु नाम । चार पदारथ में गनैं नरक द्वारहू काम ॥३५९॥ भावार्थ—बड़ोंकी संगतिसे मनुष्य बड़ा (सम्मान्य) हो जाता है और छोटोंकी सङ्गतिसे उसीका नाम छोटा हो जाता है। अर्थ, धर्म और मोक्षके साथ रहनेसे नरकके साक्षात् द्वार कामकी भी गिनती चार पदार्थोंमें होती है॥ ३५९॥ तुलसी गुरु लघुता लहत लघु संगति परिनाम । देवी देव पुकारिअत नीच नारि नर नाम ॥३६०॥
३. दोहा ३०१-४५०: कलियुग-धर्म, वैराग्य, प्रपत्ति एवं शरणागति
१२२ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच मनुष्योंकी सङ्गतिका यह परिणाम होता है कि बड़े महत्त्ववाले पुरुष भी लघुताको प्राप्त हो जाते हैं। नीच स्त्री-पुरुषोंके नाम होनेसे देवी-देवता भी लघुतासे ही पुकारे जाते हैं ॥ ३६० ॥ तुलसी किएँ कुसंग थिति होहिं दाहिने बाम । कहि सुनि सकुचिअ सूम खल गत हरि संकर नाम ॥ ३६१ ॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कुसङ्गतिमें स्थित रहनेसे अच्छे भी बुरे हो जाते हैं। हरि, शंकर आदि भगवान्के नाम परम कल्याणकारी हैं; परंतु वही नाम कंजूस और दुष्ट पुरुषोंके रख दिये जाते हैं तो लोग उन नामोंको कहते-सुनते सकुचाते हैं ॥ ३६१ ॥ बसि कुसंग चह सुजनता ताकी आस निरास । तीरथहू को नाम भो गया मगह के पास ॥ ३६२ ॥ भावार्थ—कुसङ्गतिमें निवास करके जो सज्जनताकी आशा करता है, उसकी आशा निराशामात्र है। मगधके पास बसनेसे पवित्र विष्णुपद तीर्थका नाम भी 'गया' (गया-बीता) पड़ गया ! ॥ ३६२ ॥ राम कृपाँ तुलसी सुलभ गंग सुसंग समान । जो जल परै जो जन मिलै कीजै आपु समान ॥ ३६३ ॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गङ्गाजी और सत्सङ्गति दोनों समान हैं। गङ्गाजीमें कैसा भी जल पड़े और सत्सङ्गतिमें कैसा भी दुर्जन मनुष्य जाय, उसको ये दोनों अपने ही समान पवित्र बना देती हैं। परंतु इनकी प्राप्ति श्रीरामकृपासे ही सुलभ है ॥ ३६३ ॥ ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग । होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ॥ ३६४ ॥
दोहावली १२३ भावार्थ—ग्रह, ओषधि, जल, वायु और वस्त्र—ये सभी बुरा या अच्छा सङ्ग पाकर जगत्में बुरे या अच्छे पदार्थ बन जाते हैं। इस रहस्यको अच्छे लक्षणवाले बुद्धिमान् लोग ही जान पाते हैं ॥३६४॥ जनम जोग में जानिअत जग बिचित्र गति देखि। तुलसी आखर अंक रस रंग बिभेद बिसेषि ॥३६५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जैसे अक्षर (क, ख, ग आदि), अंक (१, २, ३ आदि), रस (मीठा, खट्टा आदि) और रंग (नीला, लाल, पीला आदि) में [इनके परस्पर संयोगके भेदसे] विशेष भेद हो जाता है, ऐसे ही मनुष्यके जन्मकालमें भिन्न-भिन्न ग्रहोंका योग होता है; उसीको देखकर जगत्की विचित्र गति जानी जाती है ॥ ३६५ ॥ आखर जोरि बिचारि करु सुमति अंक लिखि लेखु। जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु ॥३६६॥ भावार्थ—अक्षरोंको जोड़कर विचार करो और हे सुमति ! अङ्कोंको लिखकर हिसाब लगाओ तो भलीभाँति समझ जाओगे कि जगत्की गति योगसे कुयोग और सुयोगमयी हो जाती है (‘धर्म’ के पहले ‘अ’ अक्षर जोड़ दो, अधर्म हो जायगा और अधर्मके आगे ‘हीन’ ये दो अक्षर जोड़ दो तो ‘अधर्मसे रहित’ अर्थ हो जायगा; इसी प्रकार १ अङ्कके आगे ०० दो शून्य लगा दो तो १०० हो जायगा, वही शून्य पहले लगा दोगे तो उस एकको भी कोई नहीं गिनेगा। इसी तरह कुसङ्गति-सुसङ्गतिसे जगत्में मनुष्य बुरा-भला हो जाता है) ॥ ३६६ ॥
१२४ दोहावली मार्ग भेदसे फल भेद करु बिचारि चलु सुपथ भल आदि मध्य परनाम। उलटि जपें 'जारा मरा' सूधें 'राजा राम' ॥३६७॥ भावार्थ—विचार करके सुमार्गपर चलो, ऐसा करनेसे आदि, मध्य और परिणाममें भला-ही-भला है। जैसे बिना विचारे उलटा जपनेसे जो शब्द 'जारा' और 'मरा' हो जाता है वही विचारपूर्वक सीधा जपनेसे 'राजा राम' हो जाता है (जो कल्याणमय है) ॥३६७॥ [भलेके भला ही हो, यह नियम नहीं है होइ भले कें अनभलो होइ दानि कें सूम। होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम ॥३६८॥ भावार्थ—जैसे पवित्र तेजोमय अग्निसे काला धुआँ निकलता है वैसे ही भलेके बुरा, दानीके कंजूस और सपूतके कपूत उत्पन्न हो जाता है ॥ ३६८ ॥ विवेककी आवश्यकता जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकारि ॥३६९॥ भावार्थ—विधाताने इस जड़-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है। परंतु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको त्याग कर गुणरूपी दूधको ग्रहण करते हैं ॥ ३६९ ॥ सोरठा पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥३७०॥
दोहावली १२५ भावार्थ—रेशम कीड़ेसे होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसीलिये अत्यन्त अपवित्र कीड़ोंको भी सब लोग प्राणोंके समान पालते हैं ॥३७०॥ दोहा जो जो जेहिं जेहिं रस मगन तहँ सो मुदित मन मानि । रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि ॥३७१॥ भावार्थ—जो-जो जिस-जिस रसमें मग्न होता है, वह उसीमें संतोष मानकर आनन्दित होता है। परंतु रसके गुण-दोषका विचार करना तो रसिकोंकी रीतिकी पहचान है (अर्थात् रसके गुण-दोषका विचार तो रसिकजन ही करते हैं) ॥३७१॥ सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह । ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥३७२॥ भावार्थ—यद्यपि शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें उजियाला और अँधेरा बराबर रहता है, तो भी विधाताने उनके नाममें भेद कर दिया है। शुक्लपक्षको चन्द्रमाका पोषक (कलाको बढ़ानेवाला) जानकर उसे जगत्में यश दिया अर्थात् यशरूप 'शुक्लपक्ष' नाम रक्खा और कृष्णपक्षको चन्द्रमाका शोषक (कलाओंको घटाने वाला) जानकर उसे अपयश दिया अर्थात् कलङ्करूप 'कृष्णपक्ष' नाम रक्खा ॥३७२॥ कभी-कभी भलेको बुराई भी मिल जाती है लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच । धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच ॥३७३॥ भावार्थ—लोक और वेदतकमें भी भलेका बुरा नाम प्रसिद्ध है। धर्मराजको यम और बिजलीको वज्र कहनेमें किसीको सोच अथवा संकोच नहीं होता ॥३७३॥
१२६ दोहावली सज्जन और दुर्जनकी परीक्षाके भिन्न-भिन्न प्रकार बिरुचि परखिए सुजन जन राखि परखिए मंद । बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद ॥३७४॥ भावार्थ—संतोंकी परख तो हमारी रुचिके बिना ही हो जाती है (उनके सरल पवित्र स्वभावसे और उनकी कृपासे हमारे बिना ही प्रयत्न उनका परिचय मिल जाता है), परंतु दुष्ट मनुष्यकी परीक्षा कुछ दिन पास रखकर करनी पड़ती है (सहज ही उसके कपटको पहचानना कठिन होता है)। बड़वानल समुद्रमें बहुत दिन रहनेके बाद समुद्रके जलको सोखता है, परंतु चन्द्रमा दर्शन देते ही समुद्रके हर्षको बढ़ाता है ॥३७४॥ नीच पुरुषकी नीचता प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल । रबिरुख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल ॥३७५॥ भावार्थ—मालिकके अनुकूल होनेपर नीच मनुष्य [अभिमानके मारे] एकदम भयंकर बन जाते हैं। जैसे दर्पण और स्फटिक सूर्यकी रुख अपनी तरफ देखकर आगकी लपटें उगलने लगते हैं ॥३७५॥ सज्जनकी सज्जनता प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार । लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि ॥३७६॥ भावार्थ—मालिकके पास रहनेसे सज्जन पुरुष सबको सुख देने- वाले हो जाते हैं, इस बातको अच्छी तरह विचार लो। बादलका जीवन खारे समुद्रका जल है; परंतु वह दूसरोंके लिये [खारा जल न देकर] सुन्दर अमृतके समान जल बरसाता है ॥३७६॥
दोहावली १२७ नीच निरावहिं निरस तरु तुलसी सींचहिं ऊख। पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख ॥३७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच मनुष्य रसहीन (सूखे) वृक्षोंको तो खेतसे उखाड़ फेंकते और रसवाले ऊखको सींचते हैं; परंतु बादल (जल बरसाकर) विष और अमृत दोनों प्रकारके वृक्षोंका समानरूपसे पोषण करता है ॥३७७॥ बरषि बिस्व हरषित करत हरत ताप अघ प्यास। तुलसी दोष न जलद को जो ज़ल जरै जवास ॥३७८॥ भावार्थ—बादल तो बरसकर समस्त विश्वको प्रसन्न करता है और सबके ताप (गर्मी), दुःख और प्यासको हरण करता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि उसके जलसे जवासा जल जाय तो इसमें बादलका कोई दोष नहीं है॥३७८॥ अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं। तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं ॥३७९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दाता अमर रहते हैं (उनकी कीर्ति संसारमें बनी रहती है) और याचक मरते हैं (मांगना मरनेके तुल्य ही है), बार-बार मरते हैं और बार-बार दान लेते हैं। फिर भी वे पापी याचक दाताको सदा दोष ही देते रहते हैं ॥३७९॥ नीचनिन्दा लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़। गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़ ॥३८०॥ भावार्थ—हाथीको देखकर कुत्ता सूखे हाड़को लेकर दौड़ जाता है (समझता है, कहीं हाथी इस हाड़को छीन न ले)। वह मूर्ख हाथीके गुण, मूल्य, आहार और बलकी महिमाको क्या जाने ? ३८०॥
१२८ दोहावली सज्जनमहिमा कें निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर । हरष विषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार ॥३८१॥ भावार्थ—कुत्ते और सियार सिंहका निरादर करें, चाहे आदर करें, हाथीको पछाड़नेवाले सिंहको इससे कोई हर्ष या शोक नहीं होता (वह कुत्ते-सियारोंकी ओर ताकता ही नहीं) ॥३८१॥ दुर्जनोंका स्वभाव ठाढ़ो द्वार न दै सकें तुलसी जे नर नीच । निंदहिं बलि हरिचंद को का कियो करन दधीच ॥३८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य नीच प्रकृतिके हैं, वे स्वयं तो द्वारपर खड़े हुए भिक्षुकको कुछ भी नहीं दे सकते, परंतु बलि और हरिश्चन्द्रकी निन्दा करते हैं और कहते हैं कि कर्ण और दधीचिने कौन बड़ा काम किया था ? ॥३८२॥ नीचकी निन्दासे उत्तम पुरुषोंका कुछ नहीं घटता ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग । स्वान सरावन के कहें लघुता लहै न गंग ॥३८३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिन श्रीगङ्गाजीकी निर्मल और तरल तरङ्गें भगवान् श्रीशंकरके मस्तकपर शोभा पाती हैं, उन श्रीगङ्गाजीकी महिमामें कुत्ते और सरावगियोंके कहनेसे कुछ कमी नहीं हो जाती ॥३८३॥ तुलसी देवल देवको लागे लाखि करोरि । काक अभागें हगि भरयो महिमा भई कि थोरि ॥३८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिस देवमन्दिरके बनवानेमें