दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १२१ साधुजन किसकी सराहना करते हैं आपु आपु कहँ सब भलो अपने कहँ कोइ कोइ। तुलसी सब कहँ जो भलो सुजन सराहिअ सोइ ॥३५७॥ भावार्थ—स्वयं अपने लिये सभी भले हैं (सभी अपनी भलाई करना चाहते हैं), कोई-कोई अपनोंकी (मित्र-बान्धवोंकी) भी भलाई करनेवाले होते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि जो सबकी भलाई करनेवाला (सुहृद्) है, साधुजनोंके द्वारा उसीकी सराहना होती है॥ ३५७॥ संगकी महिमा तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ । नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ ॥३५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अच्छी सङ्गतिसे मनुष्य अच्छा और बुरी सङ्गतिसे वही बुरा हो जाता है। हे लोगो! देखो— जो लोहा नावमें लगनेसे सबको पार उतारनेवाला और सितारमें लगनेसे मधुर संगीत सुनाकर सुख देनेवाला बन जाता है वही तलवार और तीरमें लगनेसे जीवोंका प्राणघातक हो जाता है॥ ३५८॥ गुरु संगति गुरु होइ सो लघु संगति लघु नाम । चार पदारथ में गनैं नरक द्वारहू काम ॥३५९॥ भावार्थ—बड़ोंकी संगतिसे मनुष्य बड़ा (सम्मान्य) हो जाता है और छोटोंकी सङ्गतिसे उसीका नाम छोटा हो जाता है। अर्थ, धर्म और मोक्षके साथ रहनेसे नरकके साक्षात् द्वार कामकी भी गिनती चार पदार्थोंमें होती है॥ ३५९॥ तुलसी गुरु लघुता लहत लघु संगति परिनाम । देवी देव पुकारिअत नीच नारि नर नाम ॥३६०॥