दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ दोहावली भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच मनुष्योंकी सङ्गतिका यह परिणाम होता है कि बड़े महत्त्ववाले पुरुष भी लघुताको प्राप्त हो जाते हैं। नीच स्त्री-पुरुषोंके नाम होनेसे देवी-देवता भी लघुतासे ही पुकारे जाते हैं ॥ ३६० ॥ तुलसी किएँ कुसंग थिति होहिं दाहिने बाम । कहि सुनि सकुचिअ सूम खल गत हरि संकर नाम ॥ ३६१ ॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कुसङ्गतिमें स्थित रहनेसे अच्छे भी बुरे हो जाते हैं। हरि, शंकर आदि भगवान्के नाम परम कल्याणकारी हैं; परंतु वही नाम कंजूस और दुष्ट पुरुषोंके रख दिये जाते हैं तो लोग उन नामोंको कहते-सुनते सकुचाते हैं ॥ ३६१ ॥ बसि कुसंग चह सुजनता ताकी आस निरास । तीरथहू को नाम भो गया मगह के पास ॥ ३६२ ॥ भावार्थ—कुसङ्गतिमें निवास करके जो सज्जनताकी आशा करता है, उसकी आशा निराशामात्र है। मगधके पास बसनेसे पवित्र विष्णुपद तीर्थका नाम भी 'गया' (गया-बीता) पड़ गया ! ॥ ३६२ ॥ राम कृपाँ तुलसी सुलभ गंग सुसंग समान । जो जल परै जो जन मिलै कीजै आपु समान ॥ ३६३ ॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गङ्गाजी और सत्सङ्गति दोनों समान हैं। गङ्गाजीमें कैसा भी जल पड़े और सत्सङ्गतिमें कैसा भी दुर्जन मनुष्य जाय, उसको ये दोनों अपने ही समान पवित्र बना देती हैं। परंतु इनकी प्राप्ति श्रीरामकृपासे ही सुलभ है ॥ ३६३ ॥ ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग । होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ॥ ३६४ ॥