दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १२३ भावार्थ—ग्रह, ओषधि, जल, वायु और वस्त्र—ये सभी बुरा या अच्छा सङ्ग पाकर जगत्में बुरे या अच्छे पदार्थ बन जाते हैं। इस रहस्यको अच्छे लक्षणवाले बुद्धिमान् लोग ही जान पाते हैं ॥३६४॥ जनम जोग में जानिअत जग बिचित्र गति देखि। तुलसी आखर अंक रस रंग बिभेद बिसेषि ॥३६५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जैसे अक्षर (क, ख, ग आदि), अंक (१, २, ३ आदि), रस (मीठा, खट्टा आदि) और रंग (नीला, लाल, पीला आदि) में [इनके परस्पर संयोगके भेदसे] विशेष भेद हो जाता है, ऐसे ही मनुष्यके जन्मकालमें भिन्न-भिन्न ग्रहोंका योग होता है; उसीको देखकर जगत्की विचित्र गति जानी जाती है ॥ ३६५ ॥ आखर जोरि बिचारि करु सुमति अंक लिखि लेखु। जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु ॥३६६॥ भावार्थ—अक्षरोंको जोड़कर विचार करो और हे सुमति ! अङ्कोंको लिखकर हिसाब लगाओ तो भलीभाँति समझ जाओगे कि जगत्की गति योगसे कुयोग और सुयोगमयी हो जाती है (‘धर्म’ के पहले ‘अ’ अक्षर जोड़ दो, अधर्म हो जायगा और अधर्मके आगे ‘हीन’ ये दो अक्षर जोड़ दो तो ‘अधर्मसे रहित’ अर्थ हो जायगा; इसी प्रकार १ अङ्कके आगे ०० दो शून्य लगा दो तो १०० हो जायगा, वही शून्य पहले लगा दोगे तो उस एकको भी कोई नहीं गिनेगा। इसी तरह कुसङ्गति-सुसङ्गतिसे जगत्में मनुष्य बुरा-भला हो जाता है) ॥ ३६६ ॥