दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ दोहावली मार्ग भेदसे फल भेद करु बिचारि चलु सुपथ भल आदि मध्य परनाम। उलटि जपें 'जारा मरा' सूधें 'राजा राम' ॥३६७॥ भावार्थ—विचार करके सुमार्गपर चलो, ऐसा करनेसे आदि, मध्य और परिणाममें भला-ही-भला है। जैसे बिना विचारे उलटा जपनेसे जो शब्द 'जारा' और 'मरा' हो जाता है वही विचारपूर्वक सीधा जपनेसे 'राजा राम' हो जाता है (जो कल्याणमय है) ॥३६७॥ [भलेके भला ही हो, यह नियम नहीं है होइ भले कें अनभलो होइ दानि कें सूम। होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम ॥३६८॥ भावार्थ—जैसे पवित्र तेजोमय अग्निसे काला धुआँ निकलता है वैसे ही भलेके बुरा, दानीके कंजूस और सपूतके कपूत उत्पन्न हो जाता है ॥ ३६८ ॥ विवेककी आवश्यकता जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकारि ॥३६९॥ भावार्थ—विधाताने इस जड़-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है। परंतु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको त्याग कर गुणरूपी दूधको ग्रहण करते हैं ॥ ३६९ ॥ सोरठा पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥३७०॥