दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१२४ दोहावली मार्ग भेदसे फल भेद करु बिचारि चलु सुपथ भल आदि मध्य परनाम। उलटि जपें 'जारा मरा' सूधें 'राजा राम' ॥३६७॥ भावार्थ—विचार करके सुमार्गपर चलो, ऐसा करनेसे आदि, मध्य और परिणाममें भला-ही-भला है। जैसे बिना विचारे उलटा जपनेसे जो शब्द 'जारा' और 'मरा' हो जाता है वही विचारपूर्वक सीधा जपनेसे 'राजा राम' हो जाता है (जो कल्याणमय है) ॥३६७॥ [भलेके भला ही हो, यह नियम नहीं है होइ भले कें अनभलो होइ दानि कें सूम। होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम ॥३६८॥ भावार्थ—जैसे पवित्र तेजोमय अग्निसे काला धुआँ निकलता है वैसे ही भलेके बुरा, दानीके कंजूस और सपूतके कपूत उत्पन्न हो जाता है ॥ ३६८ ॥ विवेककी आवश्यकता जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकारि ॥३६९॥ भावार्थ—विधाताने इस जड़-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है। परंतु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको त्याग कर गुणरूपी दूधको ग्रहण करते हैं ॥ ३६९ ॥ सोरठा पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥३७०॥
दोहावली १२५ भावार्थ—रेशम कीड़ेसे होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसीलिये अत्यन्त अपवित्र कीड़ोंको भी सब लोग प्राणोंके समान पालते हैं ॥३७०॥ दोहा जो जो जेहिं जेहिं रस मगन तहँ सो मुदित मन मानि । रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि ॥३७१॥ भावार्थ—जो-जो जिस-जिस रसमें मग्न होता है, वह उसीमें संतोष मानकर आनन्दित होता है। परंतु रसके गुण-दोषका विचार करना तो रसिकोंकी रीतिकी पहचान है (अर्थात् रसके गुण-दोषका विचार तो रसिकजन ही करते हैं) ॥३७१॥ सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह । ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥३७२॥ भावार्थ—यद्यपि शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें उजियाला और अँधेरा बराबर रहता है, तो भी विधाताने उनके नाममें भेद कर दिया है। शुक्लपक्षको चन्द्रमाका पोषक (कलाको बढ़ानेवाला) जानकर उसे जगत्में यश दिया अर्थात् यशरूप 'शुक्लपक्ष' नाम रक्खा और कृष्णपक्षको चन्द्रमाका शोषक (कलाओंको घटाने वाला) जानकर उसे अपयश दिया अर्थात् कलङ्करूप 'कृष्णपक्ष' नाम रक्खा ॥३७२॥ कभी-कभी भलेको बुराई भी मिल जाती है लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच । धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच ॥३७३॥ भावार्थ—लोक और वेदतकमें भी भलेका बुरा नाम प्रसिद्ध है। धर्मराजको यम और बिजलीको वज्र कहनेमें किसीको सोच अथवा संकोच नहीं होता ॥३७३॥
१२६ दोहावली सज्जन और दुर्जनकी परीक्षाके भिन्न-भिन्न प्रकार बिरुचि परखिए सुजन जन राखि परखिए मंद । बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद ॥३७४॥ भावार्थ—संतोंकी परख तो हमारी रुचिके बिना ही हो जाती है (उनके सरल पवित्र स्वभावसे और उनकी कृपासे हमारे बिना ही प्रयत्न उनका परिचय मिल जाता है), परंतु दुष्ट मनुष्यकी परीक्षा कुछ दिन पास रखकर करनी पड़ती है (सहज ही उसके कपटको पहचानना कठिन होता है)। बड़वानल समुद्रमें बहुत दिन रहनेके बाद समुद्रके जलको सोखता है, परंतु चन्द्रमा दर्शन देते ही समुद्रके हर्षको बढ़ाता है ॥३७४॥ नीच पुरुषकी नीचता प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल । रबिरुख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल ॥३७५॥ भावार्थ—मालिकके अनुकूल होनेपर नीच मनुष्य [अभिमानके मारे] एकदम भयंकर बन जाते हैं। जैसे दर्पण और स्फटिक सूर्यकी रुख अपनी तरफ देखकर आगकी लपटें उगलने लगते हैं ॥३७५॥ सज्जनकी सज्जनता प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार । लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि ॥३७६॥ भावार्थ—मालिकके पास रहनेसे सज्जन पुरुष सबको सुख देने- वाले हो जाते हैं, इस बातको अच्छी तरह विचार लो। बादलका जीवन खारे समुद्रका जल है; परंतु वह दूसरोंके लिये [खारा जल न देकर] सुन्दर अमृतके समान जल बरसाता है ॥३७६॥
दोहावली १२७ नीच निरावहिं निरस तरु तुलसी सींचहिं ऊख। पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख ॥३७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच मनुष्य रसहीन (सूखे) वृक्षोंको तो खेतसे उखाड़ फेंकते और रसवाले ऊखको सींचते हैं; परंतु बादल (जल बरसाकर) विष और अमृत दोनों प्रकारके वृक्षोंका समानरूपसे पोषण करता है ॥३७७॥ बरषि बिस्व हरषित करत हरत ताप अघ प्यास। तुलसी दोष न जलद को जो ज़ल जरै जवास ॥३७८॥ भावार्थ—बादल तो बरसकर समस्त विश्वको प्रसन्न करता है और सबके ताप (गर्मी), दुःख और प्यासको हरण करता है। तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि उसके जलसे जवासा जल जाय तो इसमें बादलका कोई दोष नहीं है॥३७८॥ अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं। तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं ॥३७९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दाता अमर रहते हैं (उनकी कीर्ति संसारमें बनी रहती है) और याचक मरते हैं (मांगना मरनेके तुल्य ही है), बार-बार मरते हैं और बार-बार दान लेते हैं। फिर भी वे पापी याचक दाताको सदा दोष ही देते रहते हैं ॥३७९॥ नीचनिन्दा लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़। गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़ ॥३८०॥ भावार्थ—हाथीको देखकर कुत्ता सूखे हाड़को लेकर दौड़ जाता है (समझता है, कहीं हाथी इस हाड़को छीन न ले)। वह मूर्ख हाथीके गुण, मूल्य, आहार और बलकी महिमाको क्या जाने ? ३८०॥
१२८ दोहावली सज्जनमहिमा कें निदरहुँ कै आदरहुँ सिंघहि स्वान सिआर । हरष विषाद न केसरिहि कुंजर गंजनिहार ॥३८१॥ भावार्थ—कुत्ते और सियार सिंहका निरादर करें, चाहे आदर करें, हाथीको पछाड़नेवाले सिंहको इससे कोई हर्ष या शोक नहीं होता (वह कुत्ते-सियारोंकी ओर ताकता ही नहीं) ॥३८१॥ दुर्जनोंका स्वभाव ठाढ़ो द्वार न दै सकें तुलसी जे नर नीच । निंदहिं बलि हरिचंद को का कियो करन दधीच ॥३८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य नीच प्रकृतिके हैं, वे स्वयं तो द्वारपर खड़े हुए भिक्षुकको कुछ भी नहीं दे सकते, परंतु बलि और हरिश्चन्द्रकी निन्दा करते हैं और कहते हैं कि कर्ण और दधीचिने कौन बड़ा काम किया था ? ॥३८२॥ नीचकी निन्दासे उत्तम पुरुषोंका कुछ नहीं घटता ईस सीस बिलसत बिमल तुलसी तरल तरंग । स्वान सरावन के कहें लघुता लहै न गंग ॥३८३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिन श्रीगङ्गाजीकी निर्मल और तरल तरङ्गें भगवान् श्रीशंकरके मस्तकपर शोभा पाती हैं, उन श्रीगङ्गाजीकी महिमामें कुत्ते और सरावगियोंके कहनेसे कुछ कमी नहीं हो जाती ॥३८३॥ तुलसी देवल देवको लागे लाखि करोरि । काक अभागें हगि भरयो महिमा भई कि थोरि ॥३८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिस देवमन्दिरके बनवानेमें
दोहावली १२९ लाखों-करोड़ों रुपये लगे हों, उसमें यदि अभागे कौएने बीट कर दी तो इससे उस मन्दिरकी महिमा थोड़े ही घट गयी (वह तो ज्यों- की-त्यों बनी रहती है) ॥ ३८४ ॥ गुणोंका ही मूल्य है, दूसरोंके आदर-अनादरका नहीं निज गुन घटत न नाग नग परखि परिहरत कोल। तुलसी प्रभु भूषन किए गुंजा बढ़े न मोल ॥३८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जंगली कोललोग गजमुक्ता- को परखकर फेंक देते हैं, इससे उसका गुण घट नहीं जाता। इसके विपरीत भगवान् श्रीकृष्णने गुंजा (घुंघची) के गहने बनाकर पहने, परंतु इससे उनकी कीमत बढ़ नहीं गयी ॥ ३८५ ॥ श्रेष्ठ पुरुषोंकी महिमाको कोई नहीं पा सकता राकापति षोड़स उअहिँ तारा गन समुदाइ। सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥३८६॥ भावार्थ—चाहे चन्द्रमा समस्त तारागणको साथ लेकर और सोलह कलाओंसे पूर्ण होकर उदय हो जाय और साथ ही सभी पहाड़ोंमें आग भी लगा दी जाय, तो भी सूर्यके उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती ॥ ३८६ ॥ दुष्ट पुरुषोंद्वारा की हुई निन्दा-स्तुतिका कोई मूल्य नहीं है भलो कहहिँ बिनु जानेहूँ बिनु जानें अपबाद। ते नर गाडुर जानि जियँ करिय न हरष बिषाद ॥३८७॥ भावार्थ—जो लोग बिना ही जाने-सुने किसीको भला बताने लगते हैं और बिना ही जाने किसीकी निन्दा करने लगते हैं, उन दोहा० ६-१०—
१३० दोहावली मनुष्योंको [ उसी मुखसे खाने और उसीसे मलत्याग करनेवाले ] चमगादड़ समझकर उनके कहनेसे अपने मनमें हर्ष-विषाद नहीं करना चाहिये ॥ ३८७ ॥ डाह करनेवालोंका कभी कल्याण नहीं होता पर सुख संपति देखि सुनि जरहिं जे जड़ बिनु आगि। तुलसी तिन के भागते चलै भलाई भागि ॥ ३८८ ॥ भावार्थ—दूसरेकी सुख-सम्पत्तिको देख-सुनकर जो मूर्ख मनुष्य बिना ही आगके जलने लगते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि उनके भाग्यसे भलाई भागकर चली जाती है (उनका कभी भला नहीं होता) ॥ ३८८ ॥ दूसरोंकी निन्दा करनेवालोंका मुँह काला होता है तुलसी जे कीरति चहहिं पर की कीरति खोइ। तिनके मुंह मसि लागिहैं मिटिहि न मरिहैं धोइ ॥ ३८९ ॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो दूसरेकी कीर्तिको मिटा- कर अपनी कीर्ति चाहते हैं, उनके मुखपर ऐसी कालिख लगेगी, जो चाहे वे उसे धो-धोकर मर जायँ, कभी नहीं छूटेगी ॥ ३८९ ॥ मिथ्या अभिमानका दुष्परिणाम तनु गुन धन महिमा धरम तेहि बिनु जेहि अभिमान। तुलसी जिअत बिडंबना परिनामहु गत जान ॥ ३९० ॥ भावार्थ—सुन्दर शरीर, सद्गुण, पर्याप्त धन, बड़ाई और धर्ममें निष्ठा—इनके न होनेपर भी जिसको मिथ्या अभिमान है—तुलसी- दासजी कहते हैं—उसका जीवन विडम्बनामात्र है (जीवनकालमें उसकी बदनामी ही होती है) और उसका परिणाम भी गया-बीता
दोहावली १३१ (बुरा) ही समझना चाहिये (मरनेपर भी उसे सद्गति नहीं मिलती) ॥३६०॥ नीचा बनकर रहना ही श्रेष्ठ है सासु ससुर गुरु मातु पितु प्रभु भयो चहै सब कोइ । होनी दूजी ओर को सुजन सराहिअ सोइ ॥३६१॥ भावार्थ—सास, ससुर, गुरु, माता, पिता और मालिक इत्यादि होना (बड़े बनकर हुक्म चलाना और सेवा कराना) तो सभी चाहते हैं; परंतु जो लोग इनके दूसरी तरफके अर्थात् बहू, दामाद, शिष्य, कन्या, पुत्र और सेवक बनना (नीचे पदमें रहकर आज्ञा मानना और सेवा करना) चाहते हैं, वही सज्जन सराहने योग्य हैं॥३६१॥ सज्जन स्वाभाविक ही पूजनीय होते हैं सठ सहि साँसति पति लहत सुजन कलेस न कायँ । गढ़ि गुढ़ि पाहन पूजिऐं गंडकि सिला सुभायँ ॥३६२॥ भावार्थ—दुष्टलोग बड़े-बड़े कष्ट सहकर तब कहीं प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं; परंतु सज्जनोंको (प्रतिष्ठाप्राप्तिमें) कुछ भी शारीरिक क्लेश नहीं होता। जैसे साधारण पत्थर जब गढ़-छुलकर मूर्तिके रूपमें आते हैं तब पूजे जाते हैं; परंतु गण्डकी नदीके पत्थर (शालग्राम- शिला) स्वाभाविक ही पूजनीय होते हैं ॥ ३६२ ॥ भूप-दरबारकी निन्दा बड़े बिबुध दरबार तें भूमि भूप दरबार । जापक पूजक पेखिअत सहत निरादर भार ॥३६३॥ भावार्थ—देवताओंके दरबारसे भी पृथ्वीके राजाओंके दरबार बड़े हैं; क्योंकि इनमें (राजाओंके दरबारमें) भगवान्के नामका जप
१३२ दोहावली करनेवाले और भगवान्की पूजा करनेवाले भी बड़ा भारी अपमान सहते देखे जाते हैं (जो देवताओंके दरबारमें असम्भव है) ॥३६३॥ छल-कपट सर्वत्र वर्जित है बिनु प्रपंच छल भीख भलि लहिय न दिएँ कलेस । बावन बलि सों छल कियो दियो उचित उपदेश ॥३६४॥ भावार्थ—विना छल-कपटके मिलनेवाली भीख ही उत्तम है, किसीको क्लेश पहुँचाकर भीख नहीं लेनी चाहिये । भगवान्ने वामन- रूप धरकर बलिसे छल किया और इसी बहाने सबको उपदेश दिया (कि छल करना बहुत बुरा है, छल करनेके कारण ही मुझे पातालमें बलिकी द्वारपाल बनना पड़ा है) ॥ ३६४ ॥ भलो भले सों छल किएँ जनम कनौड़ो होइ । श्रीपति सिर तुलसी लसति बलि बावन गति सोइ ॥३६५॥ भावार्थ—भला आदमी यदि किसी भले आदमीसे छल कर बैठता है तो उसे फिर जन्मभर उससे दबकर रहना पड़ता है । भगवान् लक्ष्मीपतिने वृन्दासे छल किया था, इससे वह तुलसीके रूपमें भगवान्- के सिरपर विराजमान रहती है; और भगवान् वामनजीने राजा बलिसे छल किया, तो उनकी भी वही गति हुई (उन्हें उसका द्वारपाल बनकर रहना पड़ा) ॥ ३६५ ॥ बिबुध काज बावन बलिहि छलो भलो जिय जानि । प्रभुता तजि सब भे तदपि मन की गइ न गलानि ॥३६६॥ भावार्थ—भगवान् वामनजीने अपने मनमें अच्छा समझकर ही देवताओंके कार्यके लिए बलिको छला, फिर अपना स्वामित्व छोड़कर उसके वशमें भी हो गये अर्थात् उसके द्वारपालतक बन गये तो भी [छल करनेके कारण] उनके मनकी ग्लानि नहीं मिटी ॥ ३६६ ॥
दोहावली १३३ जगत्में सब सीधोंको तंग करते हैं सरल बक्र गति पंच ग्रह चपरि न चितवत काहु । तुलसी सुधे सूर ससि समय बिडंबित राहु ॥३९७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सीधी-टेढ़ी (दोनों प्रकार- की) चाल चलनेवाले (मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि-इन) पाँच ग्रहोंमेंसे तो किसीको राहु जल्दी आँख उठाकर देखता भी नहीं। परंतु सीधी चालवाले सूर्य और चन्द्रमाको समयपर वही राहु त्रास देता है (भाव यह कि टेढ़ोंसे सभी डरते हैं और सीधोंको सभी खानेको तैयार रहते हैं) ॥३९७॥ दुष्टनिन्दा खल उपकार बिकार फल तुलसी जान जहान । मेढुक मर्कट बनिक बक कथा सत्य उपखान ॥३९८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि इस बातको तमाम दुनिया जानती है कि दुष्टोंके साथ उपकार करनेका फल बुरा होता है। सत्योपाख्यान नामक ग्रन्थमें लिखी हुई मेढक, बंदर, वणिक् और बगुलेकी कथाएँ इसके उदाहरण हैं ॥३९८॥ १—एक मेढकने अपने विरोधी कुटुम्बियोंका नाश करानेके लिये एक साँपको बुलाया। उसने सोचा कि साँपको पेटभर भोजन मिलेगा तो वह मेरा उपकार मानेगा और विरोधियोंका नाश हो जायगा। साँपने आकर उसके सब कुटुम्बियोंको खा डाला और फिर उस मेढकको भी खानेके लिये तैयार हो गया। उसने किसी तरह अपनी जान बचायी। २—एक बंदरकी किसी मगरसे दोस्ती थी। बंदर अपने दोस्त मगरको जंगलसे ला-लाकर मीठे फल खिलाया करता था। एक
दिन मगर अपनी स्त्रीके कहनेसे बंदरको पीठपर चढ़ाकर छलसे पानीमें ले आया और उसका कलेजा निकालना चाहा। बुद्धिमान् बंदरने उसके कपटको जानकर मगरसे कहा कि भाई ! मैं तो कलेजा घर छोड़ आया। मूर्ख मगरने उससे कहा—'अच्छा जाओ, उसे ले आओ। मगर उसे पीठपर चढ़ाकर किनारे ले गया ! बंदरने पानीसे बाहर कूदकर अपनी जान बचायी। ३—एक वणिक्की राजासे मित्रता थी, राजाको किसी मन्त्र- सिद्धिके लिये एक स्त्रीकी पूजा करनी थी। राजाने इसके लिये वणिक्से उसकी स्त्रीको माँगा। वणिक्ने विश्वास करके स्त्रीको राजाके महलमें भेज दिया। राजाके मनमें पाप आ गया और उसने स्त्रीपर बलात्कार किया। वणिक्को इससे बड़ा ही दुःख पहुँचा। ४—एक बगुलेने किसी आदमीको धनका खजाना बतलाया। परंतु उसने उपकार न मानकर उलटे उसीको मार डाला। तुलसी खल बानी मधुर सुनि समुझिअ हियँ हेरि। राम राज बाधक भई मूढ़ मंथरा चेरि ॥३९९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दुष्टकी (कपटभरी) मीठी वाणी सुनकर अपने हृदयमें अच्छी तरह विचारकर उसका मतलब समझना चाहिये (सहसा उसपर विश्वास नहीं कर लेना चाहिये)। मूढ़ दासी मंथरा छलभरी मीठी वाणीसे ही [कैकेयीको निमित्त बनाकर] रामजीके राज्याभिषेकमें बाधक हुई थी ॥३९९॥ जोंक सूधि मन कुटिल गति खल बिपरीत बिचारु। अनहित सोनित सोष जो सो हित सोखनहारु ॥४००॥ भावार्थ—जोंककी चाल टेढ़ी होती है, परंतु वह मनसे सीधी होती है; क्योंकि वह हानिकारक रक्तको ही चूसती है। परंतु
दोहावली १३५ दुष्टोंको इससे विपरीत समझना चाहिये (वे बाहरी चाल-ढालसे तो बड़े ही सीधे दीखते हैं, परंतु मनके अत्यन्त कपटी होते हैं)। क्योंकि वे तो दूसरोंके हितका ही शोषण (नाश) करनेवाले होते हैं ॥४००॥ नीच गुड़ी ज्यों जानिबो सुनि लखि तुलसीदास। ढीलि दिएँ गिरि परत महि खैंचत चढ़त अकास ॥४०१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच आदमियोंको अच्छी तरह जान-सुनकर गुड्डीके समान समझना चाहिये। जैसे गुड्डी ढील देनेसे पृथ्वीपर गिर पड़ती है और खींचनेसे आकाशमें चढ़ जाती है [इसी प्रकार दुरदुरा देनेसे नीच आदमी सीधे हो जाते हैं; पर अपनानेसे उलटे सिर चढ़ते हैं] ॥४०१॥ झरदर बरसत कोस सत बचैं जे बूँद बराइ। तुलसी तेउ खल बचन सर हए गए न पराइ ॥४०२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो सौ कोसतक बरसती हुई घनी वर्षामें भी जलकी बूंदोंसे बिना भीगे बच निकलते हैं, वे भी दुष्टोंके वचन-बाणोंसे मारे जाते हैं, भाग नहीं सकते। (घनी वर्षामें बिना भीगे निकला जा सकता है, परंतु दुष्टोंकी निन्दासे कोई नहीं बच सकता) ॥४०२॥ पेरत कोल्हू मेलि तिल तिली सनेही जानि। देखि प्रीति की रीति यह अब देखिबो रिसानि ॥४०३॥ भावार्थ—तेली तिलोंको स्नेही (इनमें तेल है यह) जानकर भी उन्हें कोल्हूमें डालकर पेरता है। यह तो प्रेम (स्नेह) की रीति देखी, अब क्रोधकी रीति देखनी है (अर्थात् जब प्रेममें भी कोल्हूमें पेरता है तब क्रोधमें तो जाने क्या करेगा) ॥४०३॥
१३६ दोहावली सहबासी काचो गिलहिं पुरजन पाक प्रबीन । कालक्षेप केहि मिलि करहिं तुलसी खग मृग मीन ॥४०४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बेचारे पक्षी, हिरन और मछली किसके साथ मिल-जुलकर अपना जीवन बितावें ? एक स्थानमें रहनेवाले-एक ही आकाशमें उड़नेवाले बाज, एक ही बनमें रहनेवाले सिंह और एक ही जलमें रहनेवाली बड़ी मछलियाँ या ग्राह आदि तो इन्हें कच्चे ही निगल जाते हैं और पुरजन (गांवों तथा नगरोंके निवासी) पाकविद्यामें निपुण होनेके कारण इन्हें पकाकर खा जाते हैं (तात्पर्य यह कि दुर्बलोंके लिये कहीं ठौर नहीं है) ॥४०४॥ जासु भरोसें सोइए राखि गोद में सीस । तुलसी तासु कुचाल तें रखवारो जगदीस ॥४०५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि विश्वास करके जिसकी गोदमें सिर रखकर सोया जाय वही [विश्वासघात करके] कुचाल करे तो फिर उस कुचालसे भगवान् ही रक्षा कर सकते हैं ॥४०५॥ मार खोज लें सौंह करि करि मत लाज न त्रास । मुए नीच ते मीच बिनु जे इन कें बिस्वास ॥४०६॥ भावार्थ—जो शपथें खा-खाकर मित्र बन जाते हैं और फिर घरका भेद जानकर एकमत करके (आपसमें साजिश करके) मित्रको मार डालते हैं, जिन्हें अपने ऐसे कुकर्मोंसे न तो लज्जा आती है और न जिन्हें ईश्वर या धर्मका डर ही लगता है—ऐसे नीचोंका जो विश्वास करते हैं, वे नीच (मन्दबुद्धि) बिना मौत मारे जाते हैं ॥४०६॥
दोहावली १३७ परद्रोही परदार रत परधन पर अपवाद। ते नर पामर पापमय देह धरें मनुजाद ॥४०७॥ भावार्थ—जो मनुष्य दूसरोंसे बैर रखते हैं तथा जिनकी परायी स्त्रीमें, पराये धनमें और परनिन्दामें आसक्ति है, वे पामर पापमय मनुष्य नर-देह धारण किये हुए राक्षस ही हैं ॥४०७॥ कपटीको पहिचानना बड़ा कठिन है बचन बेष क्यों जानिए मनमलीन नर नारि। सूपनखा मृग पूतना दसमुख प्रमुख बिचारि ॥४०८॥ भावार्थ—किसी भी पुरुष या स्त्रीके बाहरी वेष और वचनसे कैसे पता लग सकता है कि इसका मन मलिन है ? शूर्पणखा, मारीच, पूतना और रावण आदिके उदाहरणोंपर विचार करो (इनके हृदयमें कपट भरा था; परंतु ऊपरसे बड़े ही सुन्दर वेषधारी और मीठी वाणी बोलनेवाले थे, इसलिये ये पहचाने नहीं जा सके। इस प्रकार संसारमें दम्भी लोगोंको उनके वेश-भूषा और बातचीतसे पहचानना कठिन है) ॥४०८॥ कपटीसे सदा डरना चाहिये हँसनि मिलनि बोलनि मधुर कटु करतब मन मांह। छुवत जो सकुचइ सुमति सो तुलसी तिन्ह की छांह ॥४०९॥ भावार्थ—जिनका हँसना, मिलना और बोलना बड़ा ही मधुर है, परंतु जिनके मनमें कड़ुए कारनामे (कपटभरे कर्म) भरे हुए हैं— तुलसीदासजी कहते हैं—उन नीचोंकी छायाको छूनेमें भी जो सकुचाता है वही बुद्धिमान् है (अर्थात् मनके कपटी और ऊपरसे सज्जन बने हुए लोगोंसे सर्वथा अलग रहनेमें ही बुद्धिमानी है ) ॥४०६॥
१३८ दोहावली कपट ही दुष्टताका स्वरूप है कपट सार सूची सहस बाँधि बचन परबास । कियो दुराउ चहै चातुरीं सो सठ तुलसीदास ॥४१०॥ भावार्थ—जो कपटरूपी लोहेकी हजारों सूइयोंको वचनरूपी ऊपरके कपड़े (वेठन) में चतुराईसे बाँधकर छिपाना चाहता है, तुलसीदासजी कहते हैं कि वह दुष्ट है ॥४१०॥ कपटी कभी सुख नहीं पाता बचन बिचार अचार तन मन करतब छल छूति । तुलसी क्यों सुख पाइहै अंतरजामिहि धूति ॥४११॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके वचनोंमें, विचारमें, आचरणमें, शरीरमें, मनमें और कर्मोंमें छलकी छूत लगी हुई है (अर्थात् जो सब प्रकारसे कपटी है) वह इस प्रकार अन्तर्यामी परमात्माको ठगकर कैसे सुख पा सकता है ? ॥४११॥ सारदूल को स्वाँग करि कूकर की करतूति । तुलसी ता पर चाहिये कीरति विजय बिभूति ॥४१२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि लोग सिंहका-सा स्वाँग रचकर कुत्तोंके-से काम करते हैं तथा इसपर भी कीर्ति, विजय और ऐश्वर्य चाहते हैं ! ॥४१२॥ पाप ही दुःखका मूल है बड़े पाप बाढ़े किए छोटे किए लजाल । तुलसी ता पर सुख चहत बिधि सों बहुत रिसात ॥४१३॥ भावार्थ—बड़े-बड़े पाप तो बढ़-बढ़कर किये और छोटे पाप करनेमें लजाता है (सूईकी चोरीको पाप समझकर नहीं करता,
दोहावली १३९ परंतु दूसरेका धन व्यापारके नामपर हरनेमें जिसे आपत्ति नहीं है; अथवा जो नहाये बिना खानेमें तो पाप मानता है, परंतु दिन-रात कपट-छल, चोरी-हिंसा, वेश्यागमन आदिमें रचा-पचा रहता है)—तुलसीदासजी कहते हैं कि इसपर भी मनुष्य [अपनेको धर्मात्मा मानकर] सुख चाहता है और [न मिलनेपर] विधातापर क्रोध करता है ॥४१३॥ अविवेक ही दुःखका मूल है देस काल करता करम बचन बिचार बिहीन । ते सुरतरु तर दारिदी सुरसरि तीर मलीन ॥४१४॥ भावार्थ—जिनको देश, काल, कर्ता, कर्म और वचनका विचार नहीं है, वे कल्पवृक्षके नीचे रहनेपर भी दरिद्री और देवनदी श्रीगङ्गाजीके तीर पर बस कर भी पापी बने रहते हैं (अर्थात जो) इस बातका विचार नहीं करते कि किस स्थानमें किस समय किसको कैसा कर्म करना चाहिये और कैसे वचन बोलने चाहिये, वे सदा दरिद्री और पापी ही बने रहते हैं)॥४१४॥ साहसहीं कै कोप बस किएँ कठिन परिपाक । सठ संकट भाजन भए हठि कुजाति कपि काक ॥४१५॥ भावार्थ—दुःसाहस या क्रोधके वश होकर कर्म करनेसे उसका फल बहुत ही कठोर होता है । नीच और दुष्ट बालि और जयन्त इसी प्रकार हठपूर्वक कर्म करके संकटके पात्र हुए ॥४१५॥ राज करत बिनु काजहीं करहिं कुचालि कुसाजि । तुलसी ते दसकंध ज्यों जइहैं सहित समाज ॥४१६॥ भावार्थ—जो राजा राज्य करते हुए बिना ही कारण बुरी चाल
१४० दोहावली चलते हैं तथा बुरे काम करने लगते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि वे रावणकी तरह अपने समाजसहित नष्ट हो जायेंगे ॥४१६॥ राज करत बिनु काजहीं ठटहिं जे क्रूर कुठाट । तुलसी ते कुरुराज ज्यों जइहैं बारह बाट* ॥४१७॥ भावार्थ—जो क्रूर राजा राज्य करते हुए बिना ही कारण बुरे काम करने लगते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि वे दुर्योधनकी तरह बारह बाट (सब प्रकारसे नष्ट) हो जायेंगे ॥४१७॥ विपरीत बुद्धि विनाशका लक्षण है सभां सुजोधन की सकुनि सुमति सराहन जोग । द्रोन बिदुर भीषम हरिहि कहहिं प्रपंची लोग ॥४१८॥ भावार्थ—दुर्योधनकी सभामें [अत्यन्त नीच स्वभाववाला] शकुनि ही श्रेष्ठ, बुद्धिमान् और सराहनीय माना जाता था। गुरु द्रोणाचार्य, महात्मा विदुर, पितामह भीष्म और भगवान् श्रीकृष्णको तो (उस सभाके) लोग प्रपंची कहते थे ॥४१८॥ पांडु सुवन की सदसि ते नीको रिपु हित जानि । हरि हर सम सब मानिअत मोह ग्यान की बानि ॥४१९॥ भावार्थ—और पाण्डवोंकी सभामें सब लोग उन्हीं द्रोण और भीष्मको, यह भलीभाँति जानते हुए भी कि ये हमारे शत्रु कौरवोंके मित्र हैं, भगवान् विष्णु और शिवके समान मानते थे। अज्ञान और ज्ञानकी बानिका यही भेद है। (भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष ही पाण्डवोंके सहायक और पूज्य थे, महात्मा विदुरजी युद्धसे अलग थे ही। द्रोण और *मोह, दीनता, भय, ह्रास, हानि, ग्लानि क्षुधा, तृषा, क्षोभ, व्यथा, मृत्यु और अपकीर्ति—ये बारह बाट हैं।
दोहावली १४१ भीष्म कौरवोंकी ओरसे सेनानायक थे, तथापि यथार्थ ज्ञानके अभ्यासी पाण्डवोंकी सभामें सब लोग उन्हें यथार्थमें ही पूज्य समझते थे) ॥४१९॥ हित पर बढ़इ बिरोध जब अनहित पर अनुराग । राम बिमुख बिधि बाम गति सगुन अघाइ अभाग ॥४२०॥ भावार्थ—जब अपने हित करनेवालेके प्रति शत्रुता और हितका नाश करनेवालेपर प्रेम बढ़ जाता है, तब समझना चाहिये कि भगवान् श्रीरामजी उसके विमुख हैं, विधाताकी गति उसके प्रतिकूल है और यह उसके पूर्णरूपसे अभागी होनेका शकुन (चिह्न) है ॥४२०॥ सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि । सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥४२१॥ भावार्थ—स्वभावसे ही हित करनेवाले मित्र, गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर उसके अनुसार कार्य नहीं करता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी अवश्य ही हानि होती है ॥ ४२१ ॥ जोशमें आकर अनधिकार कार्य करनेवाला पछताता है भरुहाए नट भांट के चपरि चढ़े संग्राम । कै वै भाजै आइहैं कै बाँधे परिनाम ॥४२२॥ भावार्थ—भाटोंके भड़कानेसे जोशमें आकर यदि नट (नाचने- वाले) लोग सहसा लड़ाईमें चले जायँ तो उसका यही परिणाम होगा कि या तो वे रणसे भाग आवेंगे या कैद कर लिये जायेंगे ॥४२२॥ समयपर कष्ट सह लेना हितकर होता है लोक रीति फूटी सहहिं आंजी सहइ न कोइ । तुलसी जो आंजी सहइ सो आँधरो न होइ ॥४२३॥
१४२ दोहावली भावार्थ—लोगोंकी यह रीति है कि वे आंखोंके फूटनेका कष्ट तो सह लेते हैं; परंतु अंजन (सुरमा) लगानेका कष्ट नहीं सहते। तुलसीदासजी कहते हैं—जो अंजन लगानेका कष्ट सह लेता है, वह अंधा नहीं होता ॥ ४२३ ॥ भगवान् सबके रक्षक हैं भागें भल ओड़ेहुँ भलो भलो न घालें घाउ । तुलसी सब के सीस पर रखवारो रघुराउ ॥४२४॥ भावार्थ—यदि कोई तुमपर वार करे तो भाग जानेमें ही तुम्हारी भलाई है अथवा आत्मरक्षाके लिये डटकर उस वारको रोकना भी अच्छा है; परंतु बदलेमें उसपर चोट करना अच्छा नहीं है; क्योंकि रक्षा करनेवाले श्रीरघुनाथजी तो सबके सिरपर मौजूद ही हैं ॥४२४॥ लड़ना सर्वथा त्याज्य है सुमति बिचारहिं परिहरहिं दल सुमनहुँ संग्राम । सकुल गए तनु बिनु भए साखी जादौ काम ॥४२५॥ भावार्थ—पत्तों और फूलोंके द्वारा भी लड़ाई करना बुरा है, यह विचारकर बुद्धिमान् लोग उसे बिल्कुल त्याग देते हैं। इस बातके साक्षी यादव और कामदेव हैं। पत्तों (तिनकों) के द्वारा परस्पर लड़कर यादवों का सारा कुल नाश हो गया और पुष्प-बाणोंसे शिवजीपर प्रहार करनेवाला कामदेव शरीरहीन (अनङ्ग) हो गया ॥४२५॥ कलह न जानब छोट करि कलह कठिन परिनाम । लगति अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥४२६॥ भावार्थ—कलहको छोटी बात नहीं जानना चाहिये; कलहका
दोहावली १४३ परिणाम बहुत भयंकर होता है। गरीबकी छोटी-सी झोंपड़ीमें आग लगती है, परंतु परिणाममें उससे बड़े-बड़े धनियोंके धन-धाम जल जाते हैं॥ ४२६॥ क्षमाका महत्त्व क्षमा रोष के दोष गुन सुनि मनु मानहि सीख। अबिचल श्रीपति हरि भए भूसुर लहै न भीख ॥४२७॥ भावार्थ—हे मन ! क्षमा और क्रोधके गुण-दोषोंको सुनकर उनसे शिक्षा ग्रहण करो। [भृगुमुनि (ब्राह्मण) की क्रोधसे मारी हुई लातको छातीपर सहकर भगवान् विष्णुने उन्हें क्षमा कर दिया था। क्षमाके कारण] श्रीहरि तो अविचल लक्ष्मीजीके स्वामी हुए, परंतु [एक ब्राह्मणके क्रोधके परिणामस्वरूप] ब्राह्मणोंको भीख भी माँगे नहीं मिलती ॥ ४२७ ॥ कौरव पांडव जानिए क्रोध क्षमा के सीम। पाँचहि मारि न सौ सके सयौ संघारे भीम ॥४२८॥ भावार्थ—कौरवोंको क्रोधकी और पाण्डवोंको क्षमाकी सीमा समझना चाहिये; परंतु क्रोधके कारण सौ कौरव पाँच पाण्डवोंको नहीं मार सके। इधर अकेले भीमने सौ-के-सौ कौरवोंका संहार कर दिया ॥ ४२८ ॥ क्रोधकी अपेक्षा प्रेमके द्वारा वशमें करना ही जीत है बोल न मोटे मारिए मोटी रोटी मारु। जीति सहस सम हारिबो जीतें हारि निहारु ॥४२९॥ भावार्थ—किसीको मोटे बोल न मारो (हृदयको छेद डालने- वाले तीखे वचन न कहो), परंतु रोटीकी मोटी मार मारो (उसका