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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

दिन मगर अपनी स्त्रीके कहनेसे बंदरको पीठपर चढ़ाकर छलसे पानीमें ले आया और उसका कलेजा निकालना चाहा। बुद्धिमान् बंदरने उसके कपटको जानकर मगरसे कहा कि भाई ! मैं तो कलेजा घर छोड़ आया। मूर्ख मगरने उससे कहा—'अच्छा जाओ, उसे ले आओ। मगर उसे पीठपर चढ़ाकर किनारे ले गया ! बंदरने पानीसे बाहर कूदकर अपनी जान बचायी। ३—एक वणिक्‌की राजासे मित्रता थी, राजाको किसी मन्त्र- सिद्धिके लिये एक स्त्रीकी पूजा करनी थी। राजाने इसके लिये वणिक्‌से उसकी स्त्रीको माँगा। वणिक्‌ने विश्वास करके स्त्रीको राजाके महलमें भेज दिया। राजाके मनमें पाप आ गया और उसने स्त्रीपर बलात्कार किया। वणिक्‌को इससे बड़ा ही दुःख पहुँचा। ४—एक बगुलेने किसी आदमीको धनका खजाना बतलाया। परंतु उसने उपकार न मानकर उलटे उसीको मार डाला। तुलसी खल बानी मधुर सुनि समुझिअ हियँ हेरि। राम राज बाधक भई मूढ़ मंथरा चेरि ॥३९९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दुष्टकी (कपटभरी) मीठी वाणी सुनकर अपने हृदयमें अच्छी तरह विचारकर उसका मतलब समझना चाहिये (सहसा उसपर विश्वास नहीं कर लेना चाहिये)। मूढ़ दासी मंथरा छलभरी मीठी वाणीसे ही [कैकेयीको निमित्त बनाकर] रामजीके राज्याभिषेकमें बाधक हुई थी ॥३९९॥ जोंक सूधि मन कुटिल गति खल बिपरीत बिचारु। अनहित सोनित सोष जो सो हित सोखनहारु ॥४००॥ भावार्थ—जोंककी चाल टेढ़ी होती है, परंतु वह मनसे सीधी होती है; क्योंकि वह हानिकारक रक्तको ही चूसती है। परंतु