भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

दोहावली १३५ दुष्टोंको इससे विपरीत समझना चाहिये (वे बाहरी चाल-ढालसे तो बड़े ही सीधे दीखते हैं, परंतु मनके अत्यन्त कपटी होते हैं)। क्योंकि वे तो दूसरोंके हितका ही शोषण (नाश) करनेवाले होते हैं ॥४००॥ नीच गुड़ी ज्यों जानिबो सुनि लखि तुलसीदास। ढीलि दिएँ गिरि परत महि खैंचत चढ़त अकास ॥४०१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि नीच आदमियोंको अच्छी तरह जान-सुनकर गुड्डीके समान समझना चाहिये। जैसे गुड्डी ढील देनेसे पृथ्वीपर गिर पड़ती है और खींचनेसे आकाशमें चढ़ जाती है [इसी प्रकार दुरदुरा देनेसे नीच आदमी सीधे हो जाते हैं; पर अपनानेसे उलटे सिर चढ़ते हैं] ॥४०१॥ झरदर बरसत कोस सत बचैं जे बूँद बराइ। तुलसी तेउ खल बचन सर हए गए न पराइ ॥४०२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो सौ कोसतक बरसती हुई घनी वर्षामें भी जलकी बूंदोंसे बिना भीगे बच निकलते हैं, वे भी दुष्टोंके वचन-बाणोंसे मारे जाते हैं, भाग नहीं सकते। (घनी वर्षामें बिना भीगे निकला जा सकता है, परंतु दुष्टोंकी निन्दासे कोई नहीं बच सकता) ॥४०२॥ पेरत कोल्हू मेलि तिल तिली सनेही जानि। देखि प्रीति की रीति यह अब देखिबो रिसानि ॥४०३॥ भावार्थ—तेली तिलोंको स्नेही (इनमें तेल है यह) जानकर भी उन्हें कोल्हूमें डालकर पेरता है। यह तो प्रेम (स्नेह) की रीति देखी, अब क्रोधकी रीति देखनी है (अर्थात् जब प्रेममें भी कोल्हूमें पेरता है तब क्रोधमें तो जाने क्या करेगा) ॥४०३॥