दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ दोहावली सहबासी काचो गिलहिं पुरजन पाक प्रबीन । कालक्षेप केहि मिलि करहिं तुलसी खग मृग मीन ॥४०४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बेचारे पक्षी, हिरन और मछली किसके साथ मिल-जुलकर अपना जीवन बितावें ? एक स्थानमें रहनेवाले-एक ही आकाशमें उड़नेवाले बाज, एक ही बनमें रहनेवाले सिंह और एक ही जलमें रहनेवाली बड़ी मछलियाँ या ग्राह आदि तो इन्हें कच्चे ही निगल जाते हैं और पुरजन (गांवों तथा नगरोंके निवासी) पाकविद्यामें निपुण होनेके कारण इन्हें पकाकर खा जाते हैं (तात्पर्य यह कि दुर्बलोंके लिये कहीं ठौर नहीं है) ॥४०४॥ जासु भरोसें सोइए राखि गोद में सीस । तुलसी तासु कुचाल तें रखवारो जगदीस ॥४०५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि विश्वास करके जिसकी गोदमें सिर रखकर सोया जाय वही [विश्वासघात करके] कुचाल करे तो फिर उस कुचालसे भगवान् ही रक्षा कर सकते हैं ॥४०५॥ मार खोज लें सौंह करि करि मत लाज न त्रास । मुए नीच ते मीच बिनु जे इन कें बिस्वास ॥४०६॥ भावार्थ—जो शपथें खा-खाकर मित्र बन जाते हैं और फिर घरका भेद जानकर एकमत करके (आपसमें साजिश करके) मित्रको मार डालते हैं, जिन्हें अपने ऐसे कुकर्मोंसे न तो लज्जा आती है और न जिन्हें ईश्वर या धर्मका डर ही लगता है—ऐसे नीचोंका जो विश्वास करते हैं, वे नीच (मन्दबुद्धि) बिना मौत मारे जाते हैं ॥४०६॥