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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १३७ परद्रोही परदार रत परधन पर अपवाद। ते नर पामर पापमय देह धरें मनुजाद ॥४०७॥ भावार्थ—जो मनुष्य दूसरोंसे बैर रखते हैं तथा जिनकी परायी स्त्रीमें, पराये धनमें और परनिन्दामें आसक्ति है, वे पामर पापमय मनुष्य नर-देह धारण किये हुए राक्षस ही हैं ॥४०७॥ कपटीको पहिचानना बड़ा कठिन है बचन बेष क्यों जानिए मनमलीन नर नारि। सूपनखा मृग पूतना दसमुख प्रमुख बिचारि ॥४०८॥ भावार्थ—किसी भी पुरुष या स्त्रीके बाहरी वेष और वचनसे कैसे पता लग सकता है कि इसका मन मलिन है ? शूर्पणखा, मारीच, पूतना और रावण आदिके उदाहरणोंपर विचार करो (इनके हृदयमें कपट भरा था; परंतु ऊपरसे बड़े ही सुन्दर वेषधारी और मीठी वाणी बोलनेवाले थे, इसलिये ये पहचाने नहीं जा सके। इस प्रकार संसारमें दम्भी लोगोंको उनके वेश-भूषा और बातचीतसे पहचानना कठिन है) ॥४०८॥ कपटीसे सदा डरना चाहिये हँसनि मिलनि बोलनि मधुर कटु करतब मन मांह। छुवत जो सकुचइ सुमति सो तुलसी तिन्ह की छांह ॥४०९॥ भावार्थ—जिनका हँसना, मिलना और बोलना बड़ा ही मधुर है, परंतु जिनके मनमें कड़ुए कारनामे (कपटभरे कर्म) भरे हुए हैं— तुलसीदासजी कहते हैं—उन नीचोंकी छायाको छूनेमें भी जो सकुचाता है वही बुद्धिमान् है (अर्थात् मनके कपटी और ऊपरसे सज्जन बने हुए लोगोंसे सर्वथा अलग रहनेमें ही बुद्धिमानी है ) ॥४०६॥

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