दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ दोहावली कपट ही दुष्टताका स्वरूप है कपट सार सूची सहस बाँधि बचन परबास । कियो दुराउ चहै चातुरीं सो सठ तुलसीदास ॥४१०॥ भावार्थ—जो कपटरूपी लोहेकी हजारों सूइयोंको वचनरूपी ऊपरके कपड़े (वेठन) में चतुराईसे बाँधकर छिपाना चाहता है, तुलसीदासजी कहते हैं कि वह दुष्ट है ॥४१०॥ कपटी कभी सुख नहीं पाता बचन बिचार अचार तन मन करतब छल छूति । तुलसी क्यों सुख पाइहै अंतरजामिहि धूति ॥४११॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके वचनोंमें, विचारमें, आचरणमें, शरीरमें, मनमें और कर्मोंमें छलकी छूत लगी हुई है (अर्थात् जो सब प्रकारसे कपटी है) वह इस प्रकार अन्तर्यामी परमात्माको ठगकर कैसे सुख पा सकता है ? ॥४११॥ सारदूल को स्वाँग करि कूकर की करतूति । तुलसी ता पर चाहिये कीरति विजय बिभूति ॥४१२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि लोग सिंहका-सा स्वाँग रचकर कुत्तोंके-से काम करते हैं तथा इसपर भी कीर्ति, विजय और ऐश्वर्य चाहते हैं ! ॥४१२॥ पाप ही दुःखका मूल है बड़े पाप बाढ़े किए छोटे किए लजाल । तुलसी ता पर सुख चहत बिधि सों बहुत रिसात ॥४१३॥ भावार्थ—बड़े-बड़े पाप तो बढ़-बढ़कर किये और छोटे पाप करनेमें लजाता है (सूईकी चोरीको पाप समझकर नहीं करता,