दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १३९ परंतु दूसरेका धन व्यापारके नामपर हरनेमें जिसे आपत्ति नहीं है; अथवा जो नहाये बिना खानेमें तो पाप मानता है, परंतु दिन-रात कपट-छल, चोरी-हिंसा, वेश्यागमन आदिमें रचा-पचा रहता है)—तुलसीदासजी कहते हैं कि इसपर भी मनुष्य [अपनेको धर्मात्मा मानकर] सुख चाहता है और [न मिलनेपर] विधातापर क्रोध करता है ॥४१३॥ अविवेक ही दुःखका मूल है देस काल करता करम बचन बिचार बिहीन । ते सुरतरु तर दारिदी सुरसरि तीर मलीन ॥४१४॥ भावार्थ—जिनको देश, काल, कर्ता, कर्म और वचनका विचार नहीं है, वे कल्पवृक्षके नीचे रहनेपर भी दरिद्री और देवनदी श्रीगङ्गाजीके तीर पर बस कर भी पापी बने रहते हैं (अर्थात जो) इस बातका विचार नहीं करते कि किस स्थानमें किस समय किसको कैसा कर्म करना चाहिये और कैसे वचन बोलने चाहिये, वे सदा दरिद्री और पापी ही बने रहते हैं)॥४१४॥ साहसहीं कै कोप बस किएँ कठिन परिपाक । सठ संकट भाजन भए हठि कुजाति कपि काक ॥४१५॥ भावार्थ—दुःसाहस या क्रोधके वश होकर कर्म करनेसे उसका फल बहुत ही कठोर होता है । नीच और दुष्ट बालि और जयन्त इसी प्रकार हठपूर्वक कर्म करके संकटके पात्र हुए ॥४१५॥ राज करत बिनु काजहीं करहिं कुचालि कुसाजि । तुलसी ते दसकंध ज्यों जइहैं सहित समाज ॥४१६॥ भावार्थ—जो राजा राज्य करते हुए बिना ही कारण बुरी चाल