भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

१४० दोहावली चलते हैं तथा बुरे काम करने लगते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि वे रावणकी तरह अपने समाजसहित नष्ट हो जायेंगे ॥४१६॥ राज करत बिनु काजहीं ठटहिं जे क्रूर कुठाट । तुलसी ते कुरुराज ज्यों जइहैं बारह बाट* ॥४१७॥ भावार्थ—जो क्रूर राजा राज्य करते हुए बिना ही कारण बुरे काम करने लगते हैं, तुलसीदासजी कहते हैं कि वे दुर्योधनकी तरह बारह बाट (सब प्रकारसे नष्ट) हो जायेंगे ॥४१७॥ विपरीत बुद्धि विनाशका लक्षण है सभां सुजोधन की सकुनि सुमति सराहन जोग । द्रोन बिदुर भीषम हरिहि कहहिं प्रपंची लोग ॥४१८॥ भावार्थ—दुर्योधनकी सभामें [अत्यन्त नीच स्वभाववाला] शकुनि ही श्रेष्ठ, बुद्धिमान् और सराहनीय माना जाता था। गुरु द्रोणाचार्य, महात्मा विदुर, पितामह भीष्म और भगवान् श्रीकृष्णको तो (उस सभाके) लोग प्रपंची कहते थे ॥४१८॥ पांडु सुवन की सदसि ते नीको रिपु हित जानि । हरि हर सम सब मानिअत मोह ग्यान की बानि ॥४१९॥ भावार्थ—और पाण्डवोंकी सभामें सब लोग उन्हीं द्रोण और भीष्मको, यह भलीभाँति जानते हुए भी कि ये हमारे शत्रु कौरवोंके मित्र हैं, भगवान् विष्णु और शिवके समान मानते थे। अज्ञान और ज्ञानकी बानिका यही भेद है। (भगवान् श्रीकृष्ण प्रत्यक्ष ही पाण्डवोंके सहायक और पूज्य थे, महात्मा विदुरजी युद्धसे अलग थे ही। द्रोण और *मोह, दीनता, भय, ह्रास, हानि, ग्लानि क्षुधा, तृषा, क्षोभ, व्यथा, मृत्यु और अपकीर्ति—ये बारह बाट हैं।