दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १४१ भीष्म कौरवोंकी ओरसे सेनानायक थे, तथापि यथार्थ ज्ञानके अभ्यासी पाण्डवोंकी सभामें सब लोग उन्हें यथार्थमें ही पूज्य समझते थे) ॥४१९॥ हित पर बढ़इ बिरोध जब अनहित पर अनुराग । राम बिमुख बिधि बाम गति सगुन अघाइ अभाग ॥४२०॥ भावार्थ—जब अपने हित करनेवालेके प्रति शत्रुता और हितका नाश करनेवालेपर प्रेम बढ़ जाता है, तब समझना चाहिये कि भगवान् श्रीरामजी उसके विमुख हैं, विधाताकी गति उसके प्रतिकूल है और यह उसके पूर्णरूपसे अभागी होनेका शकुन (चिह्न) है ॥४२०॥ सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि । सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥४२१॥ भावार्थ—स्वभावसे ही हित करनेवाले मित्र, गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर उसके अनुसार कार्य नहीं करता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी अवश्य ही हानि होती है ॥ ४२१ ॥ जोशमें आकर अनधिकार कार्य करनेवाला पछताता है भरुहाए नट भांट के चपरि चढ़े संग्राम । कै वै भाजै आइहैं कै बाँधे परिनाम ॥४२२॥ भावार्थ—भाटोंके भड़कानेसे जोशमें आकर यदि नट (नाचने- वाले) लोग सहसा लड़ाईमें चले जायँ तो उसका यही परिणाम होगा कि या तो वे रणसे भाग आवेंगे या कैद कर लिये जायेंगे ॥४२२॥ समयपर कष्ट सह लेना हितकर होता है लोक रीति फूटी सहहिं आंजी सहइ न कोइ । तुलसी जो आंजी सहइ सो आँधरो न होइ ॥४२३॥