दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 146, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ दोहावली भावार्थ—लोगोंकी यह रीति है कि वे आंखोंके फूटनेका कष्ट तो सह लेते हैं; परंतु अंजन (सुरमा) लगानेका कष्ट नहीं सहते। तुलसीदासजी कहते हैं—जो अंजन लगानेका कष्ट सह लेता है, वह अंधा नहीं होता ॥ ४२३ ॥ भगवान् सबके रक्षक हैं भागें भल ओड़ेहुँ भलो भलो न घालें घाउ । तुलसी सब के सीस पर रखवारो रघुराउ ॥४२४॥ भावार्थ—यदि कोई तुमपर वार करे तो भाग जानेमें ही तुम्हारी भलाई है अथवा आत्मरक्षाके लिये डटकर उस वारको रोकना भी अच्छा है; परंतु बदलेमें उसपर चोट करना अच्छा नहीं है; क्योंकि रक्षा करनेवाले श्रीरघुनाथजी तो सबके सिरपर मौजूद ही हैं ॥४२४॥ लड़ना सर्वथा त्याज्य है सुमति बिचारहिं परिहरहिं दल सुमनहुँ संग्राम । सकुल गए तनु बिनु भए साखी जादौ काम ॥४२५॥ भावार्थ—पत्तों और फूलोंके द्वारा भी लड़ाई करना बुरा है, यह विचारकर बुद्धिमान् लोग उसे बिल्कुल त्याग देते हैं। इस बातके साक्षी यादव और कामदेव हैं। पत्तों (तिनकों) के द्वारा परस्पर लड़कर यादवों का सारा कुल नाश हो गया और पुष्प-बाणोंसे शिवजीपर प्रहार करनेवाला कामदेव शरीरहीन (अनङ्ग) हो गया ॥४२५॥ कलह न जानब छोट करि कलह कठिन परिनाम । लगति अगिनि लघु नीच गृह जरत धनिक धन धाम ॥४२६॥ भावार्थ—कलहको छोटी बात नहीं जानना चाहिये; कलहका