भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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दोहावली १४३ परिणाम बहुत भयंकर होता है। गरीबकी छोटी-सी झोंपड़ीमें आग लगती है, परंतु परिणाममें उससे बड़े-बड़े धनियोंके धन-धाम जल जाते हैं॥ ४२६॥ क्षमाका महत्त्व क्षमा रोष के दोष गुन सुनि मनु मानहि सीख। अबिचल श्रीपति हरि भए भूसुर लहै न भीख ॥४२७॥ भावार्थ—हे मन ! क्षमा और क्रोधके गुण-दोषोंको सुनकर उनसे शिक्षा ग्रहण करो। [भृगुमुनि (ब्राह्मण) की क्रोधसे मारी हुई लातको छातीपर सहकर भगवान् विष्णुने उन्हें क्षमा कर दिया था। क्षमाके कारण] श्रीहरि तो अविचल लक्ष्मीजीके स्वामी हुए, परंतु [एक ब्राह्मणके क्रोधके परिणामस्वरूप] ब्राह्मणोंको भीख भी माँगे नहीं मिलती ॥ ४२७ ॥ कौरव पांडव जानिए क्रोध क्षमा के सीम। पाँचहि मारि न सौ सके सयौ संघारे भीम ॥४२८॥ भावार्थ—कौरवोंको क्रोधकी और पाण्डवोंको क्षमाकी सीमा समझना चाहिये; परंतु क्रोधके कारण सौ कौरव पाँच पाण्डवोंको नहीं मार सके। इधर अकेले भीमने सौ-के-सौ कौरवोंका संहार कर दिया ॥ ४२८ ॥ क्रोधकी अपेक्षा प्रेमके द्वारा वशमें करना ही जीत है बोल न मोटे मारिए मोटी रोटी मारु। जीति सहस सम हारिबो जीतें हारि निहारु ॥४२९॥ भावार्थ—किसीको मोटे बोल न मारो (हृदयको छेद डालने- वाले तीखे वचन न कहो), परंतु रोटीकी मोटी मार मारो (उसका