दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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खूब पेट भरकर, सेवा और सहायता करके उसे वशमें करो)। इस तरहकी अपनी हारको हजारों जीतके समान समझो और उस तरहके वाक्य-बाणोंके प्रहारसे—गाली-गलौजसे जीत जानेपर भी हार ही समझो ॥ ४२९ ॥ जो परि पायँ मनाइए तासों रूठि बिचारि। तुलसी तहाँ न जीतिऐ जहँ जीतेहुँ हारि ॥४३०॥ भावार्थ—जिन (माता-पिता, आचार्य आदि गुरुजनों) को उनके पैरोंपर पड़कर मनाना कर्तव्य है, उनसे बहुत ही सोच-विचारकर रूठना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि जहाँ जीतनेमें भी हार ही होती है, वहाँ जीतना नहीं चाहिये ॥४३०॥ जूझे ते भल बूझिबो भली जीति तें हार। डहके तें डहकाइबो भलो जो करिअ बिचारि ॥४३१॥ भावार्थ—यदि विचार किया जाय तो यही प्रतीत होता है कि लड़नेकी अपेक्षा आपसमें समझौता कर लेना अच्छा है, जीतसे हार अच्छी है और किसीको ठगनेकी अपेक्षा ठगाना अच्छा है ॥४३१॥ जा रिपु सों हारेहुँ हँसी जितें पाप परितापु। तासों रारि निवारिऐ समयँ सँभारिअ आपु ॥४३२॥ भावार्थ—जिस शत्रुसे हारनेमें हँसी हो तथा जीतनेमें पाप और दुःख हो, उससे मौका पड़नेपर स्वयं ही सँभलकर झगड़ा मिटा लेना चाहिये ॥ ४३२ ॥ जो मधु मरै न मारिए माहुर देइ सो काउ। जग जिति हारे परसुधर हारि जिते रघुराउ ॥४३३॥ भावार्थ—जो शहदसे ही मर जाय उसे जहर देकर कभी नहीं