दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोहावली १४५ मारना चाहिये। परशुरामजी सारे जगत्को जीतकर भी श्रीराम- चन्द्रजीकी मधुमयी वाणीसे हार गये और श्रीरघुनाथजी परशुरामजी- के सामने अपनी हार मानकर भी जीत गये ॥ ४३३ ॥ बैर मूल हर हित बचन प्रेम मूल उपकार । दो हा सुभ संदोह सो तुलसीं किएँ बिचार ॥४३४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हितके वचन वैरकी जड़को काटनेवाले हैं और हित करना तो प्रेमकी जड़ ही है। एवं विचार करनेपर जान पड़ता है कि हाहा खाना । (विनती करना) यह तो शुभका समूह ही है ॥ ४३४ ॥ रोष न रसना खोलिएँ बरु खोलिअ तरवारि । सुनत मधुर परिनाम हित बोलिअ बचन बिचारि ॥४३५॥ भावार्थ—क्रोधमें आकर जबान नहीं खोलनी चाहिये, इससे तो तलवार खींचना बल्कि अच्छा है। [कहावत है, 'तलवारका घाव मिट जाता है, पर जबानका कभी नही मिटता ।'] विचार- विचारकर ऐसे वचन बोलने चाहिये, जो सुननेमें मीठे हों और परिणाममें हितकारी हों ॥४३५ ॥ मधुर बचन कटु बोलिबो बिनु श्रम भाग अभाग । कुहू कुहू कलकंठ रव का का कररत काग ॥४३६॥ भावार्थ—मधुर बोलना और कड़वा बोलना बिना ही श्रमके भाग्य और अभाग्यको बुलाना (निमन्त्रण देना) है। कोयल 'कुहू' 'कुहू'की ध्वनि करती है। [तो सब उसका आदर करते हैं] और कौवा 'काँव' 'काँव' कराता है [तो लोग उसे पत्थरु मारकर उड़ा देते हैं] ॥ ४३६ ॥