भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 196 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 150

१४६ दोहावली पेट न फूलत बिनु कहें कहत न लागइ ढेर । सुमति बिचारें बोलिऐ समुझि कुफेर सुफेर ॥४३७॥ भावार्थ—किसी बातके न कहनेसे तो पेट नहीं फूल जाता और कहनेसे सामने बातोंका ढेर नहीं लग जाता । अतएव समय- असमयको समझकर और पवित्र बुद्धिके द्वारा विचार करके ही यथायोग्य वचन बोलने चाहिये ॥ ४३७ ॥ वीतराग पुरुषोंकी शरण ही जगत्‌के जंजालसे बचनेका उपाय है छिद्यो न तरुनि कटाच्छ सर करेउ न कठिन सनेहु । तुलसी तिन की देह को जगत कवच करि लेहु ॥४३८॥ भावार्थ—जिनका हृदय न तो युवतियोंके कटाक्ष-बाणोंसे घायल हुआ और न जिन्होंने विषयोंमें कठिन आसक्ति ही की—तुलसीदासजी कहते हैं—उनके शरीरको जगत्‌में अपनी रक्षाके लिये कवच बना लेना चाहिये (अर्थात् ऐसे महापुरुषोंके चरणोंमें रहनेवाले मनुष्य भी विषयोंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं) ॥ ४३८ ॥ शूरवीर करनी करते हैं, कहते नहीं सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु । बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ॥४३९॥ भावार्थ—शूरवीर तो युद्धमें करनी (शूरवीरताका कार्य) करते हैं, कहकर अपनेको नहीं जनाते । शत्रुको युद्धमें उपस्थित पाकर कायर लोग ही अपने प्रतापकी डींग मारा करते हैं ॥ ४३९ ॥

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक) · पृष्ठ 150, कुल 196 में से · BharatKosha