भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १४७ अभिमानके बचन कहना अच्छा नहीं बचन कहे अभिमान के पारथ पेखत सेतु । प्रभु तिय लूटत नीच भर जय न मीचु तेहि हेतु ॥४४०॥ भावार्थ—एक समय [श्रीरामचन्द्रजीकृत रामेश्वरके पत्थरके] सेतुबन्धको देखकर अर्जुनने अभिमानके बचन कहे [कि श्रीरामजीने इतना प्रयास क्यों किया ? मैं उस समय होता तो सारा पुल बाणोंसे ही बाँध देता । इस अभिमान का फल यह हुआ कि] भगवान् श्रीकृष्णके परिवारकी स्त्रियोंको [हस्तिनापुर ले जाते समय] नीच भरोंने [उनको] लूट लिया, अर्जुन उनको जीत नहीं सके और इस अपमानसे उनका मरण हो गया [अतएव अभिमानके बचन किसीसे नहीं कहने चाहिये ]॥ ४४० ॥ दीनोंकी रक्षा करनेवाला सदा विजयी होता है राम लखन बिजई भए बनहुँ गरीब निवाज । मुखर बालि रावन गए घरहीं सहित समाज ॥४४१॥ भावार्थ—गरीबोंपर कृपा करनेवाले श्रीराम-लक्ष्मण वनमें रहते हुए भी विजयी हुए, परंतु बकवादी बालि और रावण अपने घरमें ही सारे समाजसहित नष्ट हो गये ॥ ४४१ ॥ नीतिका पालन करनेवालेके सभी सहायक बन जाते हैं खग मृग मीत पुनीत किय बनहुँ राम नयपाल । कुमति बालि दसकंठ घर सुहृद बंधु कियो काल ॥४४२॥ भावार्थ—नीतिके पालनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने वनमें भी पक्षियों (जटायु आदि) और पशुओं (वानर-भालुओं) को अपना पवित्र (सच्चा) मित्र बना लिया; परंतु बालि और रावणने घरमें ही