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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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१४८ दोहावली अपने हितैषी भाइयोंको (सुग्रीव और विभीषणको) अपना काल बना लिया ॥ ४४२ ॥ सराहनेयोग्य कौन है ? लखइ अघानो भूख ज्यों लखइ जीतिमें हारि । तुलसी सुमति सराहिये मग पग धरइ बिचारि ॥४४३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो भूखमें (अभावमें) भी अपनेको तृप्तके समान समझता है और जीतमें भी अपनी हार मानता है—इस प्रकार जो खूब विचार-विचारकर मार्गपर पैर रखता है, वह बुद्धिमान् हीं सराहनेयोग्य है। अभावका अनुभव करनेसे ही कामना होती है और कामना ही पापकी जड़ है; अतएव जो सदा अपनेको तृप्त, पूर्णकाम मानता है, उसके द्वारा पाप नहीं होते। इसी प्रकार अपनी विजय माननेसे अभिमान बढ़ता है, जो पतनका हेतु होता है। अतएव जो पुरुष प्रत्येक क्रियामें और फलमें अभिमानका त्याग कर विचारपूर्वक दोषोंसे बचता रहता है, वही बुद्धिमान् है और वही प्रशंसनीय है) ॥ ४४३ ॥ अवसरपर चूक जानेसे बड़ी हानि होती है लाभ समयको पालिबो हानि समय की चूक । सदा बिचारहिं चारुमति सुदिन कुदिन दिन दूक ॥४४४॥ भावार्थ—अनुकूल समय आनेपर काम बना लेना ही लाभ है और समयपर चूक जाना ही हानि है। इसीलिये सुन्दर बुद्धिवाले लोग इस बातका सदा विचार किया करते हैं, क्योंकि अच्छा और बुरा समय दो ही दिनका होता है। [अतएव समयपर चूक जाना बुद्धिमानी नहीं है।] (तात्पर्य यह है कि मनुष्य-जीवनका यह अवसर भगवद्भजनके लिये ही मिला है। इस समय जो चूक

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